10 हजार करोड़ से ज्यादा की संपत्ति की मालिक कोटा आईएल (इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड) महज 670 कराेड़ रुपए की देनदारियों की वजह से डूबने के कगार पर है। यदि 200-250 करोड़ रुपए की वर्किंग कैपिटल एकमुश्त मिल जाए तो कंपनी सारी देनदारियां खुद चुकाने की हैसियत रखती है।
हाथ से निकल गया था ऑर्डर
हाल ही में भारत सरकार के टेलीकॉम डिपार्टमेंट का करीब 200 करोड़ रुपए का ऑर्डर था, लेकिन कंपनी की माली हालत ऐसी है कि इस टेंडर की करीब 2 करोड़ रुपए की सिक्यूरिटी राशि जमा कराने के पैसे तक नहीं जुटा पाई। ऐसे में यह ऑर्डर हाथ से निकल गया। केंद्र तो राज्य सरकार को अधिग्रहण करने का विकल्प दे चुका, लेकिन राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। नतीजा यह हो रहा है कि 52 साल पुराना यह उद्योग इन दिनों अंतिम सांसें गिन रहा है। एक हजार से ज्यादा लोगों पर बेरोजगारी की तलवार लटकी है।
कोढ़ में खाज यह कि मदद की बजाय भारत सरकार ने आईएल की टेक्नोलॉजी, पैसा और मैनेजमेंट के दम पर आगे बढ़ी जयपुर की रील (आरईअाईएल) को भी अलग कर दिया। रील में आईएल की 51 फीसदी हिस्सेदारी है। इसके बदले आईएल को सिर्फ 48.16 करोड़ रुपए मिले। रील नवरत्न कंपनी है, इस लिहाज से यदि बाजार मूल्य पर शेयरों का निर्धारण किया जाए तो यह कम से कम 300 करोड़ बैठता है। कोटा में कोई नया उद्योग लग नहीं रहा और पुराने उद्योग बंद हो रहे हैं। सेमटेल और जेके जैसे उद्योग बंद होने का दर्द हम आज भी भुगत रहे हैं, इसके बावजूद इस ज्वलंत मुद्दे पर हमारी नुमाइंदगी करने वाले वाले जनप्रतिनिधि चुप बैठे हैं।
रूस तक सप्लाई कर चुकी आईएल
किसी जमाने में कंपनी के उत्पाद का पूरी दुनिया में डंका बजता था और रूस के थर्मल में भी यहीं के कंट्रोलिंग उपकरण लगे थे। कोटा आईएल को रेलवे के लिए सिग्नल, कंट्रोल रूम, एसपीसी पैनल, कोच साइड प्लेट्स, मिसाइल का फ्यूज (पिजियो), सपोर्टिंग रिंग, नोजल, थर्मल, रिफाइनरी व स्टील प्लांट्स के लिए कंट्रोल सिस्टम बनाने में महारत हासिल है। कुछ सालों पहले ही प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए 30 करोड़ रुपए की सीएनसी मशीनें भी खरीदी गई हैं, जो नई टेक्नोलॉजी पर बेस्ड है। कंपनी के पास ऑर्डर की भी कोई कमी नहीं है, क्योंकि जो उपकरण यहां बनते है, वैसे देश में चुनिंदा जगह ही बनते हैं।
कोटा में 183 एकड़ जमीन, देशभर में ऑफिस
कंपनी के पास कोटा में प्राइम लोकेशन पर 183 एकड़ बेशकीमती जमीन है, इसकी कीमत 10 हजार करोड़ आंकी जाती है। इसके अलावा जयपुर, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता व बड़ौदा जैसे शहरों में आलीशान ऑफिस हैं। इन दफ्तरों की कीमत भी 300 करोड़ रुपए से कम नहीं। आज इन ऑफिसों की कोई ज्यादा उपयोगिता भी नहीं है।
बाजार दर से होता मूल्यांकन तो मिलते 300 करोड़
रील को आईएल से अलग करने के बाद भारत सरकार ने तय किया कि प्रति शेयर 77.09 रुपये के मूल्य पर आईएल के 51 फीसदी शेयर (62,47,500 शेयर) खरीदेगी। सरकार के मुताबिक यह एक उचित मूल्यांकन है, जो 31 मार्च, 2015 को 48.16 करोड़ रुपए बैठता है। जबकि आईएल कर्मियों का दावा है कि बाजार दर पर मूल्यांकन होता तो आईएल को 300 करोड़ से ज्यादा मिलते।
सीए आरआर मित्तल का कहना है कि रील सरकारी कंपनी है, इसलिए इसे बाजार में लिस्टेड कराना मेरे हिसाब से संभव नहीं है। ऐसा सरकारें तब करती हैं, जब बाजार से पैसा उगाहना हो। जैसे बैंकों के मामले में किया गया था। पहले नेशनलाइज बैंक 100 फीसदी सरकार के हुआ करते थे, फिर इनमें हिस्सेदारी घटाई। रहा सवाल आईएल की जमीनें बेचने का तो यह आवंटन की शर्तों पर निर्भर करता है। ऐसे मामलों में रीको या यूआईटी के साथ मिलकर जमीनें बेची जा सकती हैं।
हाथ से निकल गया था ऑर्डर
हाल ही में भारत सरकार के टेलीकॉम डिपार्टमेंट का करीब 200 करोड़ रुपए का ऑर्डर था, लेकिन कंपनी की माली हालत ऐसी है कि इस टेंडर की करीब 2 करोड़ रुपए की सिक्यूरिटी राशि जमा कराने के पैसे तक नहीं जुटा पाई। ऐसे में यह ऑर्डर हाथ से निकल गया। केंद्र तो राज्य सरकार को अधिग्रहण करने का विकल्प दे चुका, लेकिन राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। नतीजा यह हो रहा है कि 52 साल पुराना यह उद्योग इन दिनों अंतिम सांसें गिन रहा है। एक हजार से ज्यादा लोगों पर बेरोजगारी की तलवार लटकी है।
कोढ़ में खाज यह कि मदद की बजाय भारत सरकार ने आईएल की टेक्नोलॉजी, पैसा और मैनेजमेंट के दम पर आगे बढ़ी जयपुर की रील (आरईअाईएल) को भी अलग कर दिया। रील में आईएल की 51 फीसदी हिस्सेदारी है। इसके बदले आईएल को सिर्फ 48.16 करोड़ रुपए मिले। रील नवरत्न कंपनी है, इस लिहाज से यदि बाजार मूल्य पर शेयरों का निर्धारण किया जाए तो यह कम से कम 300 करोड़ बैठता है। कोटा में कोई नया उद्योग लग नहीं रहा और पुराने उद्योग बंद हो रहे हैं। सेमटेल और जेके जैसे उद्योग बंद होने का दर्द हम आज भी भुगत रहे हैं, इसके बावजूद इस ज्वलंत मुद्दे पर हमारी नुमाइंदगी करने वाले वाले जनप्रतिनिधि चुप बैठे हैं।
रूस तक सप्लाई कर चुकी आईएल
किसी जमाने में कंपनी के उत्पाद का पूरी दुनिया में डंका बजता था और रूस के थर्मल में भी यहीं के कंट्रोलिंग उपकरण लगे थे। कोटा आईएल को रेलवे के लिए सिग्नल, कंट्रोल रूम, एसपीसी पैनल, कोच साइड प्लेट्स, मिसाइल का फ्यूज (पिजियो), सपोर्टिंग रिंग, नोजल, थर्मल, रिफाइनरी व स्टील प्लांट्स के लिए कंट्रोल सिस्टम बनाने में महारत हासिल है। कुछ सालों पहले ही प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए 30 करोड़ रुपए की सीएनसी मशीनें भी खरीदी गई हैं, जो नई टेक्नोलॉजी पर बेस्ड है। कंपनी के पास ऑर्डर की भी कोई कमी नहीं है, क्योंकि जो उपकरण यहां बनते है, वैसे देश में चुनिंदा जगह ही बनते हैं।
कोटा में 183 एकड़ जमीन, देशभर में ऑफिस
कंपनी के पास कोटा में प्राइम लोकेशन पर 183 एकड़ बेशकीमती जमीन है, इसकी कीमत 10 हजार करोड़ आंकी जाती है। इसके अलावा जयपुर, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता व बड़ौदा जैसे शहरों में आलीशान ऑफिस हैं। इन दफ्तरों की कीमत भी 300 करोड़ रुपए से कम नहीं। आज इन ऑफिसों की कोई ज्यादा उपयोगिता भी नहीं है।
बाजार दर से होता मूल्यांकन तो मिलते 300 करोड़
रील को आईएल से अलग करने के बाद भारत सरकार ने तय किया कि प्रति शेयर 77.09 रुपये के मूल्य पर आईएल के 51 फीसदी शेयर (62,47,500 शेयर) खरीदेगी। सरकार के मुताबिक यह एक उचित मूल्यांकन है, जो 31 मार्च, 2015 को 48.16 करोड़ रुपए बैठता है। जबकि आईएल कर्मियों का दावा है कि बाजार दर पर मूल्यांकन होता तो आईएल को 300 करोड़ से ज्यादा मिलते।
सीए आरआर मित्तल का कहना है कि रील सरकारी कंपनी है, इसलिए इसे बाजार में लिस्टेड कराना मेरे हिसाब से संभव नहीं है। ऐसा सरकारें तब करती हैं, जब बाजार से पैसा उगाहना हो। जैसे बैंकों के मामले में किया गया था। पहले नेशनलाइज बैंक 100 फीसदी सरकार के हुआ करते थे, फिर इनमें हिस्सेदारी घटाई। रहा सवाल आईएल की जमीनें बेचने का तो यह आवंटन की शर्तों पर निर्भर करता है। ऐसे मामलों में रीको या यूआईटी के साथ मिलकर जमीनें बेची जा सकती हैं।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai