हनुमान जयंती महोत्सव के तहत गोदावरी धाम पर वानर सेना की ओर से मंगलवार को हुए अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में कवियों ने देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा। मंच का सबसे ज्यादा फोकस देशभक्ति से ओतप्रोत रचनाओं पर रहा, जिन्हें दर्शक दीर्घा में मौजूद युवाओं ने पूरे मन से सुना।
जमकर बटोरी तालियां
देश के मौजूदा माहौल पर चिंता जताती वीर रस के कवि विनीत चौहान की पंक्तियां थीं-”जिस थाली में खाते हैं, ये छेद उसी में करते हैं, स्वर्ग सरीखी धरती है पर मां कहने से डरते हैं’। वतन पर अपना सबकुछ न्यौछावर करने वाले फौजियों के सम्मान में नरेश निर्भीक ने पढ़ा-”सैनिक वो होता है जो, हम सब की खातिर जीता है, हम पीते हैं बिसलरी , वो हिम पिघलाकर पीता है’। खुद निर्भीक भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके हैं, लिहाजा उनकी पंक्तियों को श्रोताओं ने पूरी इज्जत से सुना और उसी सम्मान से तालियां बजाई। लखनऊ से आई कवयित्री कविता तिवारी ने “बिना मौसम हृदय कोकिल से है कूजा नहीं जाता, जहां अनुराग पलता हो वहां दूजा नहीं जाता, विभीषण रामजी के भक्त हैं ये जानते सब हैं, मगर जो देशद्रोही हो उसे पूजा नहीं जाता’ रचना से देश में रहकर देश के खिलाफ बात करने वालों पर कटाक्ष किया। इंदौर से आए प्रोफेसर राजीव शर्मा ने हंसी-मजाक व हल्के-फुल्के माहौल में ही राजनीतिक परिदृश्य पर कई कटाक्ष किए।
क्या है भगवा संस्कृति की पहचान
मथुरा से आए मनवीर मधुर ने “धर्म के विरुद्ध युद्ध वाला भाव देखा यदि, ज्यादा क्रुद्ध होंगे मुट्ठियां भींच लेंगे हम’। धौलपुर से आई कवयित्री बृजेंद्र चकोर ने “नाम कन्हैया सुना लगा तू श्री कृष्ण के वंश का है, पर डीएनए से पता चला है तू तो कपूत कंस का है’ सुनाई। आगरा से आई डॉ. रुचि चतुर्वेदी ने गीत-गजल सुनाए। धार से आए संदीप शर्मा ने “मरते वक्त आस ये करते तुलसी हो अपने मुख में, वृक्षों की पूजा करते हैं हम सुख में हो या दुख में..’ कविता से भगवा संस्कृति की पहचान बताई। चंबल नदी के किनारे और गोदावरी के पावन घाट पर हुए इस आयोजन में देर रात तक श्रोता डटे रहे।
नहीं करें देश का अपमान
देशभर में वीर रस की कविताओं के लिए मशहूर कवि विनीत चौहान ने भास्कर से देश के वर्तमान माहौल पर विशेष बातचीत की। चौहान ने कहा कि देश में विचारों की स्वतंत्रता के नाम पर उच्छृंखलता चल रही है। अभिव्यक्ति की आजादी उस हद तक जायज है, जिस हद तक देश के सम्मान को आंच न आए। भारत माता के खिलाफ नारे लगाने व राष्ट्रध्वज का अपमान करने का हक किसी को नहीं और वर्तमान में यही सबकुछ हो रहा है, मैं इसे बदतमीजी की श्रेणी में मानता हूं।
कैसी कार्रवाई की जरूरत
असल में देश में आजादी से अब तक राष्ट्रीयता को राजनीतिक तराजू में रखकर देखा जाता रहा है। नतीजा यह हो गया कि अब यह बीमारी कैंसर का रूप ले चुकी। हाल ही में श्रीनगर एनआईटी में यह देखा। अब इसके इलाज की नहीं बल्कि ऑपरेशन की जरूरत है। श्रीलंका में लिट्टे से तो बड़ी नहीं है, लेकिन श्रीलंका ने लिट्टे को नेस्तनाबूत कर दिया। हम तो उससे कई गुना बड़ा देश है, फिर इतनी छोटी सी समस्या को कैसे दूर नहीं कर पा रहे। देश को ठोस और कड़े कदम उठाने की जरूरत है।
जमकर बटोरी तालियां
देश के मौजूदा माहौल पर चिंता जताती वीर रस के कवि विनीत चौहान की पंक्तियां थीं-”जिस थाली में खाते हैं, ये छेद उसी में करते हैं, स्वर्ग सरीखी धरती है पर मां कहने से डरते हैं’। वतन पर अपना सबकुछ न्यौछावर करने वाले फौजियों के सम्मान में नरेश निर्भीक ने पढ़ा-”सैनिक वो होता है जो, हम सब की खातिर जीता है, हम पीते हैं बिसलरी , वो हिम पिघलाकर पीता है’। खुद निर्भीक भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके हैं, लिहाजा उनकी पंक्तियों को श्रोताओं ने पूरी इज्जत से सुना और उसी सम्मान से तालियां बजाई। लखनऊ से आई कवयित्री कविता तिवारी ने “बिना मौसम हृदय कोकिल से है कूजा नहीं जाता, जहां अनुराग पलता हो वहां दूजा नहीं जाता, विभीषण रामजी के भक्त हैं ये जानते सब हैं, मगर जो देशद्रोही हो उसे पूजा नहीं जाता’ रचना से देश में रहकर देश के खिलाफ बात करने वालों पर कटाक्ष किया। इंदौर से आए प्रोफेसर राजीव शर्मा ने हंसी-मजाक व हल्के-फुल्के माहौल में ही राजनीतिक परिदृश्य पर कई कटाक्ष किए।
क्या है भगवा संस्कृति की पहचान
मथुरा से आए मनवीर मधुर ने “धर्म के विरुद्ध युद्ध वाला भाव देखा यदि, ज्यादा क्रुद्ध होंगे मुट्ठियां भींच लेंगे हम’। धौलपुर से आई कवयित्री बृजेंद्र चकोर ने “नाम कन्हैया सुना लगा तू श्री कृष्ण के वंश का है, पर डीएनए से पता चला है तू तो कपूत कंस का है’ सुनाई। आगरा से आई डॉ. रुचि चतुर्वेदी ने गीत-गजल सुनाए। धार से आए संदीप शर्मा ने “मरते वक्त आस ये करते तुलसी हो अपने मुख में, वृक्षों की पूजा करते हैं हम सुख में हो या दुख में..’ कविता से भगवा संस्कृति की पहचान बताई। चंबल नदी के किनारे और गोदावरी के पावन घाट पर हुए इस आयोजन में देर रात तक श्रोता डटे रहे।
नहीं करें देश का अपमान
देशभर में वीर रस की कविताओं के लिए मशहूर कवि विनीत चौहान ने भास्कर से देश के वर्तमान माहौल पर विशेष बातचीत की। चौहान ने कहा कि देश में विचारों की स्वतंत्रता के नाम पर उच्छृंखलता चल रही है। अभिव्यक्ति की आजादी उस हद तक जायज है, जिस हद तक देश के सम्मान को आंच न आए। भारत माता के खिलाफ नारे लगाने व राष्ट्रध्वज का अपमान करने का हक किसी को नहीं और वर्तमान में यही सबकुछ हो रहा है, मैं इसे बदतमीजी की श्रेणी में मानता हूं।
कैसी कार्रवाई की जरूरत
असल में देश में आजादी से अब तक राष्ट्रीयता को राजनीतिक तराजू में रखकर देखा जाता रहा है। नतीजा यह हो गया कि अब यह बीमारी कैंसर का रूप ले चुकी। हाल ही में श्रीनगर एनआईटी में यह देखा। अब इसके इलाज की नहीं बल्कि ऑपरेशन की जरूरत है। श्रीलंका में लिट्टे से तो बड़ी नहीं है, लेकिन श्रीलंका ने लिट्टे को नेस्तनाबूत कर दिया। हम तो उससे कई गुना बड़ा देश है, फिर इतनी छोटी सी समस्या को कैसे दूर नहीं कर पा रहे। देश को ठोस और कड़े कदम उठाने की जरूरत है।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai