युवक को बच्चे की तरह एनेस्थीसिया देकर किया ऑपरेशन

युवक को बच्चे की तरह एनेस्थीसिया देकर किया ऑपरेशन

युवक को बच्चे की तरह एनेस्थीसिया देकर किया ऑपरेशन

नए अस्पताल में एनीस्थिसिया व अस्थि रोग विभाग के डॉक्टरों की टीम ने एक ऐसे युवक का ऑपरेशन करने में सफलता प्राप्त की है, जिसके फेफड़े व स्पाइनल कोर्ड पूरी तरह विकृत हैं। ऑपरेशन में सबसे बड़ी चुनौती रोगी को बेहोश करना था।
जीवन में पहला ऐसा केस
क्योंकि वयस्क लोगों को ऑपरेशन से पहले बेहोश करने के लिए फेफड़े या स्पाइनल कोर्ड से ही दवा दी जाती है। आखिरकार डॉक्टरों ने बच्चों में प्रयुक्त विधा से इस युवक को एनीस्थिसिया दिया और सर्जरी कराई। वरिष्ठ डॉक्टर कह रहे हैं कि उन्होंने जीवन में पहला ऐसा केस किया है। एनीस्थिसिया विभाग के प्रोफेसर डॉ. चेतन शुक्ला ने बताया कि गत दिनों ऑर्थोपेडिक विभाग में डॉ. आरपी मीणा के पास झालावाड़ जिले का दिनेश (25) नाम का यह रोगी आया।
फेफड़े पूरी क्षमता से काम नहीं करते
गिरने से उसके दाएं पैर की दोनों हड्डियों में फ्रैक्चर हो गया था। रोगी बचपन में सीवियर पोलियो का शिकार हुआ था, ऐसे में उसके फेफड़े व रीढ़ की हड्डी समेत शरीर का निचला हिस्सा पूरा फंक्शनल नहीं था। डॉ. मीणा ऑपरेशन करने को तैयार थे, लेकिन एनीस्थिसिया के नजरिए से उसे एक्जामिन करना था। जांच में पता चला कि उसके फेफड़े पूरी क्षमता से काम नहीं करते और फेफड़ों के आकार का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। ऐसे में ट्यूब के जरिए लंग्स में एनीस्थिसिया नहीं दिया जा सकता था। दूसरा विकल्प रीढ़ की हड्डी से एनीस्थिसिया देने का था, लेकिन इसकी पूरी कोर्ड ही मुड़ी हुई है, ऐसे में यहां भी संभव नहीं था।
बेहोश करना संभव नहीं
केस पर एनीस्थिसिया विभाग में विस्तार से चर्चा हुई। आखिरकार तय किया कि बच्चों वाले तरीके से कोडल एनीस्थिसिया देकर ही रोगी की सर्जरी कराई जा सकती है, इसमें भी रिस्क है। वयस्कों में प्रयुक्त दोनों ही तरीकों से इसे बेहोश करना संभव नहीं। डॉ. शुक्ला के साथ डॉ. संजय कालानी, डॉ. विजेता की टीम ने कोडल एनीस्थिसिया देकर शनिवार को रोगी की सर्जरी कराई गई, ऑपरेशन सफल रहा और फिलहाल वह हड्डी वार्ड में भर्ती है। डॉ. शुक्ला ने बताया कि उनके 30 साल के अनुभव में यह पहला ऐसा मामला था, जिसमें हर तरीके से रोगी को बेहोश करने में रिस्क थे।
एनीस्थिसिया देने के 3 तरीके, तीनों में था रिस्क
-जनरल तरीके से लंग्स में दवा देकर रोगी को बेहोश कर दिया जाए, लेकिन इस रोगी में फेफड़े पूरी क्षमता से फंक्शनल नहीं थे और इस कदर विकृत थे कि कोई अनुमान सटीक नहीं बैठ सकता था।
- स्पाइनल फ्लूड में दवा देकर बेहोश किया जाए, लेकिन इसकी पूरी स्पाइनल कोर्ड ही विकृत थी, ऐसे में गलती होने की 100 फीसदी आशंका थी। गलती होने पर बड़ा जोखिम था।
- कोडल एनीस्थिसिया से बच्चों में स्पाइनल वाले हिस्से में स्किन के नीचे ही दवा दी जाती है, इससे बच्चे बेहोश हो जाते हैं। इस रोगी में यही तरीका अपनाया गया, लेकिन रिस्क यह था कि वह बेहोश हो या नहीं हो।

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2 Comments

  1. Visitor Photo
    By : Amritlal

    Job

  2. Visitor Photo
    By : Devesh

    Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai

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