पुलिस ने सैकड़ों लोगों की मौत के सच को मेडिकल कॉलेज की मोर्चरी में दफन कर दिया है। पोस्टमार्टम के दौरान लिए जाने वाले विसरा के सेंपल को एफएसएल और अन्य लैब में भेजना होता है, लेकिन पुलिस ने सैकड़ों सेंपलों को पोस्टमार्टम रूम से बाहर ही नहीं निकाला। इनमें से कई सेंपल तो 5 साल से पड़े-पड़े पोस्टमार्टम रूम में ही गल गए।
सेंपलों को रखने की जगह नहीं
7 दिन से 6 महीने के भीतर इन अंगों से सच खोजकर निकालना था। एमबीएस अस्पताल के पोस्टमार्टम रूम का एक कमरा तो कब का इन विसरा सेंपलों से भर चुका और ताले की चाबी भी खो गई। दूसरा कमरे में भी इन सेंपलों को रखने की अब जगह नहीं बची है। ऐसा भी नहीं है कि पुलिस वाले भूल गए तो किसी ने याद नहीं दिलाया।
मर्डर मिस्ट्री सुलझाती है विसरा
अस्पताल प्रशासन ने पिछले साल ही आईजी को लेटर लिखा था। लेकिन कुछ सेंपल ले जाने के बाद पुलिस फिर दूसरे कामों में व्यस्त हो गई। मौत की गुत्थी को सुलझाने में ये विसरा महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। पोस्टमार्टम रूम से ये सेंपल पुलिस को एफएसएल या मेडिकल कॉलेज पहुंचाने होते हैं।
कई की स्लिप भी गल गई
-कई सेंपल के ऊपर लगी नाम, केस नंबर की स्लिप गल गई या चूहे कुतर गए।
-ऐसे में मामलों में ये ही पता नहीं चलेगा कि सेंपल किस केस का है।
- अधिकतम वैधता 6 महीने
जहरीले पदार्थ
-7 दिन से 3 माह के भीतर ऑटोलाइसिस (स्वत: गल जाना) हो जाते हैं।
डीएनए सेंपल
- 7 दिन में लैब पहुंचना जरूरी।
बीमारी व अन्य संदिग्ध मामलों में
- 3 से 6 माह तक सुरक्षित रहते हैं, उसके बाद जांच योग्य नहीं रहते।
-कई मामलों में पुलिसकर्मी सेंपल लेकर ही नहीं जाते।
-पिछले साल भी तत्कालीन आईजी को पत्र लिखा था। उसके बाद कुछ हलचल हुई थी।
-छबड़ा आदि थानों से पुलिसकर्मी आकर सेंपल ले गए थे, लेकिन उसके बावजूद बड़ी संख्या में सेंपल यहीं पड़े हैं। पुलिसकर्मी बिना जांच के रिपोर्ट कैसे दे रहे हैं या जांच क्यों नहीं करवाते, ये तो बताना मुश्किल है।
आईजी विशाल बंसल ने कहा है कि यदि पुलिसकर्मी सेंपल नहीं ले जा रहे हैं और लैब में जांच नहीं करवा रहे तो गंभीर मामला है। इस संबंध में सभी एसपी को पत्र लिखकर जवाब मांगा जाएगा। जो पुलिसकर्मी इसके लिए दोषी होंगे उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
सरकारी फाइल की तरह भर चुकी हैं आलमारियां
अधिकांश मामलों में मेडिकल ज्यूरिस्ट ओपिनियन रिजर्व रखकर विसरा (पेट, लीवर, हार्ट, किडनी आदि के कुछ पार्ट) निकालकर जार में रख देते हैं। जहरीले पदार्थ से मौत के मामले में पुलिस इन सेंपलों को फोरेंसिक साइंस लैब तथा बीमारी या अन्य मामलों में जांच के लिए मेडिकल कॉलेज की पैथोलॉजी लैब में भेजती है।
कई महीनों से चाबी नहीं मिल रही
जिन मामलों में बाद में भी पुलिस इन्हें लेने नहीं आती, वो पोस्टमार्टम रूम में ही बने कमरों में रख दिए जाते हैं। पिछले सालों से कई मामलों में सेंपल यहां से गए ही नहीं और यहीं पड़े रह गए। इन सेंपलों से एक कमरा तो भर चुका है। जिस पर ताला लगा रखा है और कई महीनों से चाबी भी नहीं मिल रही। अब दूसरे कमरे की अलमारी भी भर चुकी है। उसके बाद जमीन पर जार रखे हुए हैं।
सेंपलों को रखने की जगह नहीं
7 दिन से 6 महीने के भीतर इन अंगों से सच खोजकर निकालना था। एमबीएस अस्पताल के पोस्टमार्टम रूम का एक कमरा तो कब का इन विसरा सेंपलों से भर चुका और ताले की चाबी भी खो गई। दूसरा कमरे में भी इन सेंपलों को रखने की अब जगह नहीं बची है। ऐसा भी नहीं है कि पुलिस वाले भूल गए तो किसी ने याद नहीं दिलाया।
मर्डर मिस्ट्री सुलझाती है विसरा
अस्पताल प्रशासन ने पिछले साल ही आईजी को लेटर लिखा था। लेकिन कुछ सेंपल ले जाने के बाद पुलिस फिर दूसरे कामों में व्यस्त हो गई। मौत की गुत्थी को सुलझाने में ये विसरा महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। पोस्टमार्टम रूम से ये सेंपल पुलिस को एफएसएल या मेडिकल कॉलेज पहुंचाने होते हैं।
कई की स्लिप भी गल गई
-कई सेंपल के ऊपर लगी नाम, केस नंबर की स्लिप गल गई या चूहे कुतर गए।
-ऐसे में मामलों में ये ही पता नहीं चलेगा कि सेंपल किस केस का है।
- अधिकतम वैधता 6 महीने
जहरीले पदार्थ
-7 दिन से 3 माह के भीतर ऑटोलाइसिस (स्वत: गल जाना) हो जाते हैं।
डीएनए सेंपल
- 7 दिन में लैब पहुंचना जरूरी।
बीमारी व अन्य संदिग्ध मामलों में
- 3 से 6 माह तक सुरक्षित रहते हैं, उसके बाद जांच योग्य नहीं रहते।
-कई मामलों में पुलिसकर्मी सेंपल लेकर ही नहीं जाते।
-पिछले साल भी तत्कालीन आईजी को पत्र लिखा था। उसके बाद कुछ हलचल हुई थी।
-छबड़ा आदि थानों से पुलिसकर्मी आकर सेंपल ले गए थे, लेकिन उसके बावजूद बड़ी संख्या में सेंपल यहीं पड़े हैं। पुलिसकर्मी बिना जांच के रिपोर्ट कैसे दे रहे हैं या जांच क्यों नहीं करवाते, ये तो बताना मुश्किल है।
आईजी विशाल बंसल ने कहा है कि यदि पुलिसकर्मी सेंपल नहीं ले जा रहे हैं और लैब में जांच नहीं करवा रहे तो गंभीर मामला है। इस संबंध में सभी एसपी को पत्र लिखकर जवाब मांगा जाएगा। जो पुलिसकर्मी इसके लिए दोषी होंगे उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
सरकारी फाइल की तरह भर चुकी हैं आलमारियां
अधिकांश मामलों में मेडिकल ज्यूरिस्ट ओपिनियन रिजर्व रखकर विसरा (पेट, लीवर, हार्ट, किडनी आदि के कुछ पार्ट) निकालकर जार में रख देते हैं। जहरीले पदार्थ से मौत के मामले में पुलिस इन सेंपलों को फोरेंसिक साइंस लैब तथा बीमारी या अन्य मामलों में जांच के लिए मेडिकल कॉलेज की पैथोलॉजी लैब में भेजती है।
कई महीनों से चाबी नहीं मिल रही
जिन मामलों में बाद में भी पुलिस इन्हें लेने नहीं आती, वो पोस्टमार्टम रूम में ही बने कमरों में रख दिए जाते हैं। पिछले सालों से कई मामलों में सेंपल यहां से गए ही नहीं और यहीं पड़े रह गए। इन सेंपलों से एक कमरा तो भर चुका है। जिस पर ताला लगा रखा है और कई महीनों से चाबी भी नहीं मिल रही। अब दूसरे कमरे की अलमारी भी भर चुकी है। उसके बाद जमीन पर जार रखे हुए हैं।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai