विश्व प्रसिद्ध मोटिवेटर शिव खेड़ा सोमवार को कोटा में थे। यूआईटी ऑडिटोरियम में हुई एक मोटिवेशनल वर्कशॉप में उन्होंने बताया कि आप किसी काम में तभी सफल हो सकते हो उस काम को हाथ और दिमाग की बजाय दिल से करो। यह भी बताया कि टाइम रूपी एरोप्लेन में आपको पायलट बनकर बैठना होगा, पैसेंजर नहीं, और इसके लिए जरूरी है डायरेक्शन।
टीचर स्कूल में पेरेंट्स के रोल में होते हैं
एजुकेशन में कोटा का नाम नेशनल और ग्लोबल लेवल पर सुना। इंटरनेट से पता चला कि हर साल यहां से शानदार अचीवमेंट्स आ रहे हैं। अभी और आगे बढ़ते रहो। मेरे विचार से टीचर स्कूल में पेरेंट्स के रोल में हैं, जबकि घर में पेरेंट्स ही टीचर हैं। जरा ध्यान से सोचें, प्रतिदिन हम इस नियम को कितना निभाते हैं। जिंदगी में सफल होना है तो किसान की तरह बनना पड़ेगा। हमें अच्छा बगीचा तो चाहिए तो अच्छे बीज प्लांट करने ही होंगे। बच्चों को स्कूल में रिपेयर नहीं, प्रिपेयर करें।
90 फीसदी बिजनेस फेल
15 साल पहले तक 15 फीसदी ग्लोबल बिजनेस पांच साल में ही पुराने हो जाते थे। बदलाव की स्पीड यह है कि अब जिस दिन प्रोडक्ट लांच होता है, उसी तारीख की रात तक पुराना हो जाता है। सभी नए अवसर देख रहे हैं। इस दौर में अमेरिका में 90 फीसदी बिजनेस फेल हो रहे हैं। हमारे देश में बीटेक और एमबीबीएस के फ़र्स्ट ईयर में जो पढ़ते हैं, वह फाइनल ईयर तक पुराना हो जाता है। नॉलेज दो-तीन साल तक चलती है।
ट्रेनिंग की जरूरत
सक्सेस के ब्लू प्रिंट समझें तो आज पीपुल प्रॉब्लम्स सबसे पहले आती हैं। कुछ लोग रिकॉर्ड ब्रेक करते हैं। वहीं कुछ खुद को ब्रेक करने में लगे हैं। मुझे एक किस्सा याद आता है। 1972 में म्यूनिख ओलंपियाड में सात गोल्ड मेडल जीतने पर स्विमिंग एथलीट मार्क स्पिट्ज से कहा गया था कि- आप लकी हैं। उसने जबाव दिया- रोज आठ घंटे पानी में रहें तो आप भी लकी हो सकते हैं। उसने 4 साल में 10 हजार घंटों तक पानी में ट्रेनिंग ली। यानी रोज आठ घंटे पानी में रहा। इसलिए भाग्य हमें डिजाइन नहीं दे सकता। इसके लिए ट्रेनिंग की जरूरत है। कोटा में शिक्षक खुद कोच बनकर अच्छी ट्रेनिंग दे रहे हैं।
अलग ढंग से काम करना जरूरी
याद रखें, हर प्रॉब्लम फिर एक नई प्रॉब्लम देती है। सफलता इससे नहीं नापी जा सकती कि आप कितने ऊपर पहुंचे हैं। बल्कि यह देखो गिरकर कितनी बार ऊपर उठे। अपनी क्षमता के अनुसार आप कैसा कर रहे हैं। जीतने वाले हर काम सिर्फ हाथ या दिमाग से नहीं दिल से भी करते हैं। वे हर काम अलग ढंग से करते हैं।
टीचर स्कूल में पेरेंट्स के रोल में होते हैं
एजुकेशन में कोटा का नाम नेशनल और ग्लोबल लेवल पर सुना। इंटरनेट से पता चला कि हर साल यहां से शानदार अचीवमेंट्स आ रहे हैं। अभी और आगे बढ़ते रहो। मेरे विचार से टीचर स्कूल में पेरेंट्स के रोल में हैं, जबकि घर में पेरेंट्स ही टीचर हैं। जरा ध्यान से सोचें, प्रतिदिन हम इस नियम को कितना निभाते हैं। जिंदगी में सफल होना है तो किसान की तरह बनना पड़ेगा। हमें अच्छा बगीचा तो चाहिए तो अच्छे बीज प्लांट करने ही होंगे। बच्चों को स्कूल में रिपेयर नहीं, प्रिपेयर करें।
90 फीसदी बिजनेस फेल
15 साल पहले तक 15 फीसदी ग्लोबल बिजनेस पांच साल में ही पुराने हो जाते थे। बदलाव की स्पीड यह है कि अब जिस दिन प्रोडक्ट लांच होता है, उसी तारीख की रात तक पुराना हो जाता है। सभी नए अवसर देख रहे हैं। इस दौर में अमेरिका में 90 फीसदी बिजनेस फेल हो रहे हैं। हमारे देश में बीटेक और एमबीबीएस के फ़र्स्ट ईयर में जो पढ़ते हैं, वह फाइनल ईयर तक पुराना हो जाता है। नॉलेज दो-तीन साल तक चलती है।
ट्रेनिंग की जरूरत
सक्सेस के ब्लू प्रिंट समझें तो आज पीपुल प्रॉब्लम्स सबसे पहले आती हैं। कुछ लोग रिकॉर्ड ब्रेक करते हैं। वहीं कुछ खुद को ब्रेक करने में लगे हैं। मुझे एक किस्सा याद आता है। 1972 में म्यूनिख ओलंपियाड में सात गोल्ड मेडल जीतने पर स्विमिंग एथलीट मार्क स्पिट्ज से कहा गया था कि- आप लकी हैं। उसने जबाव दिया- रोज आठ घंटे पानी में रहें तो आप भी लकी हो सकते हैं। उसने 4 साल में 10 हजार घंटों तक पानी में ट्रेनिंग ली। यानी रोज आठ घंटे पानी में रहा। इसलिए भाग्य हमें डिजाइन नहीं दे सकता। इसके लिए ट्रेनिंग की जरूरत है। कोटा में शिक्षक खुद कोच बनकर अच्छी ट्रेनिंग दे रहे हैं।
अलग ढंग से काम करना जरूरी
याद रखें, हर प्रॉब्लम फिर एक नई प्रॉब्लम देती है। सफलता इससे नहीं नापी जा सकती कि आप कितने ऊपर पहुंचे हैं। बल्कि यह देखो गिरकर कितनी बार ऊपर उठे। अपनी क्षमता के अनुसार आप कैसा कर रहे हैं। जीतने वाले हर काम सिर्फ हाथ या दिमाग से नहीं दिल से भी करते हैं। वे हर काम अलग ढंग से करते हैं।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai