न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (एनएमसीएच ) में गुरुवार सुबह वार्डों के बीचोंबीच आग लग गई। रेडियोलॉजी विभाग के पीछे पार्क में उगी झाड़ियों में लगी आग से गलियारों व वार्डों में धुआं भर गया। इससे रोगियों व तीमारदारों में अफरा-तफरी मच गई। ओपीडी व रेडियोलॉजी विभाग में जांचों के लिए बैठे रोगी घबराकर बाहर आ गए। हालांकि अस्पताल के ही कुछ कर्मचारियों ने हिम्मत दिखाते हुए फायर एक्सटिंग्युशर से करीब 30 मिनट में आग पर काबू पा लिया। आग से इलेक्ट्रिक पैनल जल गया, जिससे रेडियोलॉजी विभाग की लाइट करीब 3 घंटे बंद रही। इसके चलते रोजाना के मुकाबले 10 फीसदी मरीजों की भी एक्स-रे, एमआरआई व अन्य जांचें नहीं हो पाईं। आग का प्रारंभिक कारण पार्क के ऊपर बने मेडिसिन वार्ड से किसी व्यक्ति द्वारा बीड़ी फेंकना माना जा रहा है।
कर्मचारियों ने दिखाया साहस
अस्पताल के रेडियोग्राफर प्रभारी उजागर सिंह व बीपीएल काउंटर प्रभारी सुनील शांडिल्य ने समझदारी दिखाई और अपनी टीम के साथ कुछ ही मिनट में इस आग पर काबू पा लिया। शांडिल्य का तो घटना में हाथ भी जल गया। उन्होंने बताया कि वे काउंटर पर ही थे, तभी गैलरी से भीड़ भागती हुई आई। लोगों ने बताया कि आग लग गई, सिलेंडर फट रहे हैं। मैं वहां गया और एमआरआई से फायर एक्सटिंग्युशर लाया और लपटों से गुजरकर दूसरे छोर पर जाकर आग बुझाने में जुट गया। उजागर ने बताया कि मशीनों को समय पर बंद कर दिया था, इलेक्ट्रिक पैनल में आग से इन महंगी मशीनों में नुकसान हो सकता था।
बड़ी चूक : अस्पताल में स्थायी अग्निशमन प्रणाली ही नहीं
आग की सूचना के बाद मौके पर पहुंची दमकल तो भीतर ही नहीं घुस पाई। वह पूरे समय बाहर ही खड़ी रही और वहीं से वापस चली गई। दमकलकर्मी भी इस बात से परेशान थे कि आग बढ़ गई तो कैसे बुझाएंगे। भास्कर ने इसकी पड़ताल की तो पता चला कि अस्पताल में स्थायी अग्निशमन प्रणाली ही नहीं है। जबकि ऐसी इमारतों और खास तौर से अस्पतालों में यह जरूरी होता है।
छोटी सी आग छोड़ गई बड़े सवाल-
स्थायी अग्निशमन प्रणाली क्या?
इसमें आग बुझाने के लिए स्थायी पाइप लाइन व अन्य उपकरण लगे होते हैं। अलग-अलग हिस्सों में पानी लेने के लिए हाइड्रेंट, ऊपर पानी पहुंचाने के लिए राइजर, पानी के प्रेशर के लिए हॉज रील, फायर अलार्म, पोर्टेबल फायर एक्सटिंग्युशर, रेत की बाल्टियां, पोर्टेबल पंप व वाटर टैंक आदि होते हैं। नए अस्पताल में आग बुझाने के उपकरणों के नाम पर सिर्फ कुछ फायर एक्सटिंग्युशर हैं। जबकि शहर के सभी बड़े निजी हॉस्पिटलों में स्थायी अग्निशमन प्रणाली के सारे उपकरण हैं।
प्राइवेट हॉस्पिटलों के लिए ही हैं नियम कायदे!
नगर निगम का अग्निशमन विभाग प्राइवेट हॉस्पिटलों पर सारे कायदे लागू करता है, लेकिन सरकारी हॉस्पिटलों की ओर कोई नहीं देखता। यहां तक कि अस्पतालों के निर्माण के वक्त भी इस बात का कोई ध्यान नहीं रखा जाता।
हादसों से भी नहीं लिया सबक
वर्ष 2011 में कोलकाता के एक निजी हॉस्पिटल में भीषण आग लगी थी, इसमें 90 लोगों की जान गई थी। इसके बाद राज्य सरकारें हरकत में आईं और जिला स्तर पर भी कलेक्टरों ने बैठकें लेकर सभी हॉस्पिटलों में आग बुझाने की व्यवस्थाओं का रिव्यू किया था। कोटा में रिव्यू तो हुआ, लेकिन धरातल पर कोई काम नहीं हुआ। इसके बाद जेके लोन अस्पताल में भी दो बार आग लग चुकी।
-नए अस्पताल में स्थायी अग्निशमन प्रणाली नहीं है। यदि होती तो बाहर से दमकल से पाइप जोड़कर मौके पर पानी पहुंचाया जा सकता था। ऐसे भवनों में सारे सिस्टम होने चाहिए। हालांकि आज आग ज्यादा नहीं थी, लेकिन ऐसी घटनाएं कभी भी हो सकती हैं। अस्पताल प्रशासन को चाहिए कि इस पर ध्यान दे।
- राकेश व्यास, अग्निशमन अधिकारी, नगर निगम
-वैसे तो ये सब काम निर्माण के वक्त ही ध्यान में रखे जाते हैं। हमारे अस्पताल में उस वक्त इन बिंदुओं पर ध्यान नहीं दिया गया। आज की घटना से मैं भी सबक ले रहा हूं। अग्निशमन विभाग वालों से चर्चा कर स्थायी अग्निशमन सिस्टम डेवलप किया जाएगा। - डॉ. सीएस सुशील, अधीक्षक, एनएमसीएच
कर्मचारियों ने दिखाया साहस
अस्पताल के रेडियोग्राफर प्रभारी उजागर सिंह व बीपीएल काउंटर प्रभारी सुनील शांडिल्य ने समझदारी दिखाई और अपनी टीम के साथ कुछ ही मिनट में इस आग पर काबू पा लिया। शांडिल्य का तो घटना में हाथ भी जल गया। उन्होंने बताया कि वे काउंटर पर ही थे, तभी गैलरी से भीड़ भागती हुई आई। लोगों ने बताया कि आग लग गई, सिलेंडर फट रहे हैं। मैं वहां गया और एमआरआई से फायर एक्सटिंग्युशर लाया और लपटों से गुजरकर दूसरे छोर पर जाकर आग बुझाने में जुट गया। उजागर ने बताया कि मशीनों को समय पर बंद कर दिया था, इलेक्ट्रिक पैनल में आग से इन महंगी मशीनों में नुकसान हो सकता था।
बड़ी चूक : अस्पताल में स्थायी अग्निशमन प्रणाली ही नहीं
आग की सूचना के बाद मौके पर पहुंची दमकल तो भीतर ही नहीं घुस पाई। वह पूरे समय बाहर ही खड़ी रही और वहीं से वापस चली गई। दमकलकर्मी भी इस बात से परेशान थे कि आग बढ़ गई तो कैसे बुझाएंगे। भास्कर ने इसकी पड़ताल की तो पता चला कि अस्पताल में स्थायी अग्निशमन प्रणाली ही नहीं है। जबकि ऐसी इमारतों और खास तौर से अस्पतालों में यह जरूरी होता है।
छोटी सी आग छोड़ गई बड़े सवाल-
स्थायी अग्निशमन प्रणाली क्या?
इसमें आग बुझाने के लिए स्थायी पाइप लाइन व अन्य उपकरण लगे होते हैं। अलग-अलग हिस्सों में पानी लेने के लिए हाइड्रेंट, ऊपर पानी पहुंचाने के लिए राइजर, पानी के प्रेशर के लिए हॉज रील, फायर अलार्म, पोर्टेबल फायर एक्सटिंग्युशर, रेत की बाल्टियां, पोर्टेबल पंप व वाटर टैंक आदि होते हैं। नए अस्पताल में आग बुझाने के उपकरणों के नाम पर सिर्फ कुछ फायर एक्सटिंग्युशर हैं। जबकि शहर के सभी बड़े निजी हॉस्पिटलों में स्थायी अग्निशमन प्रणाली के सारे उपकरण हैं।
प्राइवेट हॉस्पिटलों के लिए ही हैं नियम कायदे!
नगर निगम का अग्निशमन विभाग प्राइवेट हॉस्पिटलों पर सारे कायदे लागू करता है, लेकिन सरकारी हॉस्पिटलों की ओर कोई नहीं देखता। यहां तक कि अस्पतालों के निर्माण के वक्त भी इस बात का कोई ध्यान नहीं रखा जाता।
हादसों से भी नहीं लिया सबक
वर्ष 2011 में कोलकाता के एक निजी हॉस्पिटल में भीषण आग लगी थी, इसमें 90 लोगों की जान गई थी। इसके बाद राज्य सरकारें हरकत में आईं और जिला स्तर पर भी कलेक्टरों ने बैठकें लेकर सभी हॉस्पिटलों में आग बुझाने की व्यवस्थाओं का रिव्यू किया था। कोटा में रिव्यू तो हुआ, लेकिन धरातल पर कोई काम नहीं हुआ। इसके बाद जेके लोन अस्पताल में भी दो बार आग लग चुकी।
-नए अस्पताल में स्थायी अग्निशमन प्रणाली नहीं है। यदि होती तो बाहर से दमकल से पाइप जोड़कर मौके पर पानी पहुंचाया जा सकता था। ऐसे भवनों में सारे सिस्टम होने चाहिए। हालांकि आज आग ज्यादा नहीं थी, लेकिन ऐसी घटनाएं कभी भी हो सकती हैं। अस्पताल प्रशासन को चाहिए कि इस पर ध्यान दे।
- राकेश व्यास, अग्निशमन अधिकारी, नगर निगम
-वैसे तो ये सब काम निर्माण के वक्त ही ध्यान में रखे जाते हैं। हमारे अस्पताल में उस वक्त इन बिंदुओं पर ध्यान नहीं दिया गया। आज की घटना से मैं भी सबक ले रहा हूं। अग्निशमन विभाग वालों से चर्चा कर स्थायी अग्निशमन सिस्टम डेवलप किया जाएगा। - डॉ. सीएस सुशील, अधीक्षक, एनएमसीएच
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai