शहर के बीच ही बीच स्थित सेना का एरिया। सफाई के मामले में यह एक मिसाल है। यहां सड़कें तो छोड़ो सड़क के बगल का क्षेत्र या पार्क से भी आप कचरा नहीं ढूंढ पाएंगे। और तो और डस्टबिन तक बिल्कुल साफ मिलते हैं। इस तरह की सफाई के पीछे है सेना का मॉनिटरिंग सिस्टम। जबकि प्रति सफाई कर्मी के हिसाब से काम की बात करें तो बाकी शहर से सेना के सफाई श्रमिकों के पास काम भी ज्यादा है। कोटा शहर के 76 हजार एकड़ में सफाई का जिम्मा 3236 सफाई श्रमिकों के जिम्मे है, जबकि सेना के 1749 एकड़ का सफाई का काम 45 श्रमिकों के पास है। यानी सेना का एक सफाई श्रमिक 32 एकड़ को साफ करता है और निगम का एक श्रमिक 23 एकड़ को साफ करता है। इसके बावजूद शहर की सड़कों पर कचरे के ढेर लगे हैं।
110 अधिकारी भी नहीं कर पाते मॉनिटरिंग
3236 सफाई कर्मचारी है। उनकी मॉनिटरिंग के लिए पूरा एक विभाग है जिसमें जमादार से लेकर उपायुक्त तक करीब 110 अधिकारियों व कर्मचारियों का भारी लवाजमा है। जनप्रतिनिधि के तौर पर पार्षद से लेकर महापौर तक इसकी निगरानी के लिए जिम्मेदार है। उनके बावजूद किस तरह की सफाई व मॉनिटरिंग हो रही है ये भास्कर पिछले चार दिनों से लगातार छापामार रिपोर्टिंग करके बता रहा है।
ये है सेना का मैकेनिज्म: कचरा मिलने पर पूरी यूनिट पर लगता है जुर्माना
सेना क्षेत्र 1749 एकड़ का है और 750 मीटर मुख्य सड़कें हैं। सफाई के लिए ठेके पर 45 सफाईकर्मी हैं। औसत हर दिन 32 आते हैं। इनसे सफाई करवाने के लिए 60 पूर्व सफाईकर्मी लगे हैं। निगरानी के लिए 6 सुपरवाइजर हैं। सभी की मॉनिटरिंग के लिए इलाके वाइज एक-एक सेना के जवान की ड्यूटी है। 8 घंटे सफाई होती है। एक घंटे का लंच होता है। इस दौरान सभी सुपरवाइजर फील्ड में घूमते रहते हैं। सफाई होने के बाद सेना का जवान चैक करता है। जिस यूनिट में कचरा मिलता है, उस पर सामूहिक जुर्माना लगाया जाता है। कर्मचारी के बैठा हुआ दिखने पर पूरे दिन की अनुपस्थिति लगती है।
डस्टबिन के बाहर कोई कचरा नहीं
सेना क्षेत्र में बने सीमेंटेड डस्टबिन इतने साफ हैं कि बाहरी व्यक्ति दूर से इन्हें पहचान नहीं सकता। यहां आवारा पशु तो नहीं हैं, लेकिन बंदरों से बचाने के लिए इन्हें जालियों से कवर कर रखा है। कचरा बाहर नहीं आ सकता। कचरा निकालने के लिए साइड में जाली के गेट से ताला खोलना होता है।
पूरे सीजन में आर्मी क्षेत्र में एक भी डेंगू पेशेंट नहीं
पिछले दिनाें पूरा शहर डेंगू से जूझ रहा था, जिसका मुख्य कारण गंदगी था। वहीं सेना क्षेत्र में डेंगू का एक भी मरीज रिकॉर्ड नहीं हुआ। क्योंकि वहां सफाई इतनी रहती है कि मच्छर होते ही नहीं। आर्मी के जो बच्चे शहर के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं, उनमें 8 बच्चों को डेंगू हुआ था।
110 अधिकारी भी नहीं कर पाते मॉनिटरिंग
3236 सफाई कर्मचारी है। उनकी मॉनिटरिंग के लिए पूरा एक विभाग है जिसमें जमादार से लेकर उपायुक्त तक करीब 110 अधिकारियों व कर्मचारियों का भारी लवाजमा है। जनप्रतिनिधि के तौर पर पार्षद से लेकर महापौर तक इसकी निगरानी के लिए जिम्मेदार है। उनके बावजूद किस तरह की सफाई व मॉनिटरिंग हो रही है ये भास्कर पिछले चार दिनों से लगातार छापामार रिपोर्टिंग करके बता रहा है।
ये है सेना का मैकेनिज्म: कचरा मिलने पर पूरी यूनिट पर लगता है जुर्माना
सेना क्षेत्र 1749 एकड़ का है और 750 मीटर मुख्य सड़कें हैं। सफाई के लिए ठेके पर 45 सफाईकर्मी हैं। औसत हर दिन 32 आते हैं। इनसे सफाई करवाने के लिए 60 पूर्व सफाईकर्मी लगे हैं। निगरानी के लिए 6 सुपरवाइजर हैं। सभी की मॉनिटरिंग के लिए इलाके वाइज एक-एक सेना के जवान की ड्यूटी है। 8 घंटे सफाई होती है। एक घंटे का लंच होता है। इस दौरान सभी सुपरवाइजर फील्ड में घूमते रहते हैं। सफाई होने के बाद सेना का जवान चैक करता है। जिस यूनिट में कचरा मिलता है, उस पर सामूहिक जुर्माना लगाया जाता है। कर्मचारी के बैठा हुआ दिखने पर पूरे दिन की अनुपस्थिति लगती है।
डस्टबिन के बाहर कोई कचरा नहीं
सेना क्षेत्र में बने सीमेंटेड डस्टबिन इतने साफ हैं कि बाहरी व्यक्ति दूर से इन्हें पहचान नहीं सकता। यहां आवारा पशु तो नहीं हैं, लेकिन बंदरों से बचाने के लिए इन्हें जालियों से कवर कर रखा है। कचरा बाहर नहीं आ सकता। कचरा निकालने के लिए साइड में जाली के गेट से ताला खोलना होता है।
पूरे सीजन में आर्मी क्षेत्र में एक भी डेंगू पेशेंट नहीं
पिछले दिनाें पूरा शहर डेंगू से जूझ रहा था, जिसका मुख्य कारण गंदगी था। वहीं सेना क्षेत्र में डेंगू का एक भी मरीज रिकॉर्ड नहीं हुआ। क्योंकि वहां सफाई इतनी रहती है कि मच्छर होते ही नहीं। आर्मी के जो बच्चे शहर के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं, उनमें 8 बच्चों को डेंगू हुआ था।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai