मैं आत्महत्या करने पर मजबूर हूं, बच्चों को होमगार्ड में भर्ती मत करवाना

मैं आत्महत्या करने पर मजबूर हूं, बच्चों को होमगार्ड में भर्ती मत करवाना

मैं आत्महत्या करने पर मजबूर हूं, बच्चों को होमगार्ड में भर्ती मत करवाना

चंबल किनारे होमगार्ड के जवान का सुसाइड नोट मिलने के बाद पूरे डिपार्टमेंट पर सवाल खड़े हो गए है। होमगार्ड विभाग में आखिर ऐसा क्या चल रहा है? जब इस सवाल का जवाब जानने के लिए भास्कर रिपोर्टर ने कुछ होमगार्ड के जवानों से बातचीत की तो उनके आंखों से आंसू निकल आए। बोले- जिंदा तो दूर होमगार्ड विभाग में ड्यूटी करते-करते जान देने के बाद भी हमारी कोई कदर नहीं है। जिसने भी कल्याण कोष से मदद मांगनी चाही विभाग ने उसे डिस्चार्ज कर दिया। ऐसे कुछ मामले सामने आए, जिनमें होमगार्ड के जवानों ने अपनी दुख भरी दास्तां बताई।


फिर किस बात का कल्याण कोष
राज्य होमगार्ड के कल्याण कोष (वेलफेयर फंड) में करोड़ों रुपए जमा है। लेकिन, अधिकारी कोई भी मामला आते ही नियम-कानून बताने लगते हैं और किसी को कोई मदद नहीं करते। राजस्थान होमगार्ड परिवार कल्याण संस्था के अध्यक्ष पाल शंकर मेवाड़ा व महासचिव राजेन्द्र सुमन ने बताया कि हर जवान की ड्यूटी पर होमगार्ड विभाग 10 प्रतिशत संबंधित एजेंसी से लेता है। इसके अलावा हर जवान के सालाना 50 रुपए अलग से जमा होते है। ताकी जरूरत पड़ने (दुर्घटना/मौत) पर वो पैसा जवानों के काम आ सके। लेकिन, विभाग कभी इनकी मदद नहीं करता।


दुर्घटना हो या मौत जवान करें संपर्क
^मुझे केवल लक्ष्मीचंद मेवाड़ा का मामला पता है, जो विधि सेवा प्राधिकरण से मुख्यालय होता हुआ आया है। परिजनों द्वारा संपर्क करने के बाद उन्हें जरूर मदद दी जाएगी। जवान दुर्घटना के बाद विभाग से संपर्क नहीं करते इसलिए उन्हें मदद नहीं मिल पाती। - अनवर एच खान, कमांडेंट होमगार्ड विभाग कोटा

 

लड़ते-लड़ते मौत हो गई, पत्नी ने भी छोड़ दी उम्मीद
सकतपुरा, कुन्हाड़ी निवासी लक्ष्मीचंद मेवाड़ा की फरवरी 2012 में ड्यूटी के दौरान सीवी गार्डन में साइकिल से गिरकर कूल्हे की हड्डी टूटी, किडनी और लीवर फेल हाे गया। जिंदगी से लड़ते-लड़ते 2015 में उसकी मौत हो गई। विभाग ने मदद मांगने पर उसे पूरे माह उपस्थित बताकर कोई मदद करने से साफ इनकार कर दिया। पत्नी गायत्री चार सालों से यही सवाल कर रही है कि जब मेरा पति अस्पताल में भर्ती था तो उसे उपस्थित कैसे बता दिया? अब गायत्री ने विधि सेवा प्राधिकरण की शरण ली है।

 

4 ऑपरेशन करवाने के बाद जिंदगी से हारा जवान
चंद्रेसल निवासी नरेन्द्र बैरवा का सितंबर 2008 में अंटाघर चौराहे पर एक ट्रक एक्सीडेंट में पैर फैक्चर हुआ। साथी ट्रैफिक कर्मियों ने 10 हजार का चंदा करके उसे अस्पताल में भर्ती करवाया। दो सालों तक नरेन्द्र का कोटा और जयपुर में प्लास्टिक सर्जरी के बाद 4 बार ऑपरेशन हो चुके है। पिता मांगीलाल ने अपना मकान गिरवी रखकर बेटे नरेन्द्र का इलाज करवाया। नरेन्द्र ने बताया कि तीन साल बिस्तर पर पड़े रहने के बाद अब मैं जिंदगी से हार चुका हूं। विभाग से मदद मांगी तो बदले में मुझे डिस्चार्ज कर दिया गया।

 

मदद मांगने गई तो मिली गालियां बोला- तुम नाटक मत करो

गोविंद नगर निवासी शिमला बाई सितंबर 2009 में यूआईटी के साथ विनोबा भावे नगर में अतिक्रमण हटाने गई। जहां लाठी-भाठा जंग के दौरान वो मरते-मरते बची। साथी कर्मचारियों ने उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, लेकिन विभाग आज तक हाल पूछने तक नहीं गया। पैर फैक्चर हुआ तो एक साल बिस्तरों पर रही। जब विभाग से मदद मांगने गई तो बदले में गालियां मिली। विभाग ने बोला- तुम नाटक मत करो। ड्यूटी पर आती नहीं हो और पैर टूटने का बहाना बनाकर मदद मांगती हो। इसके बाद शिमला बाई को भी डिस्चार्ज कर दिया गया।

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2 Comments

  1. Visitor Photo
    By : Amritlal

    Job

  2. Visitor Photo
    By : Devesh

    Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai

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