कोटा के डॉक्टरों ने महज 24 घंटे के नवजात की जटिल सर्जरी करते हुए जान बचा ली। बच्चे में आहार नाल नहीं थी, ऐसे में वह दूध नहीं पी पा रहा था। समय रहते सर्जरी नहीं की जाती तो आहार न मिलने से बच्चे की मौत हो जाती। डॉक्टरों का दावा है कि यह इस तरह की राज्य की पहली सर्जरी है।
मैत्री हॉस्पिटल के निदेशक शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अशोक शारदा व पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. अशोक गोयल ने बुधवार को पत्रकारों को इसकी जानकारी दी। दोनों ने बताया कि रामगंजमंडी की रेखा का मोड़क स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव हुआ। बच्चा स्तनपान नहीं कर पा रहा था। सांस में भी तकलीफ थी। वे उसे मैत्री हॉस्पिटल लाए और जांचों में पता चला कि बच्चे के खाने की नली नहीं बनी थी, इसे प्योर इसोफेजियल अट्रेजिया कहते हैं।
दो बार में होती है सर्जरी
पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. गोयल ने बताया कि सामान्यतः इस बीमारी में बच्चे का जन्म के समय पहली और सालभर बाद दूसरी सर्जरी की जाती है। पहली सर्जरी में ऊपर की नली का हिस्सा गर्दन के बाहर बनाते हैं, जिससे वह जो भी खाता है वह गर्दन से बाहर आ जाता है तथा पेट में ऑपरेशन कर खाने की नली डाल दी जाती है। बच्चे को 1 साल तक इसी नली से खाद्य पदार्थ दिए जाते हैं। सालभर बाद दूसरा ऑपरेशन किया जाता है, जिसमें कि पेट (आमाशय) को छाती के द्वारा दिल के पीछे से लाकर गर्दन वाले छेद से जोड़ा जाता है।
यह था रिस्क फैक्टर
लेकिन इस केस में परिजनों से गहन चर्चा के बाद उनकी सहमति से एक बार में ही ऑपरेशन करने का निर्णय किया। जोखिम इसलिए ज्यादा था, क्योंकि बच्चा 24 घंटे पहले ही पैदा हुआ था और उसका वजन सिर्फ 2 किलो था। करीब 3 घंटे की सर्जरी में इसके पेट को छाती के माध्यम से दिल के पीछे से लेते हुए गर्दन में खाने की नली से जोड़ा गया। ऑपरेशन के बाद बच्चे को 24 घंटे शिशु रोग विशेषज्ञ की देखरेख में करीब 10 दिन तक वेंटीलेटर पर रखना पड़ा। अब बच्चा स्वस्थ है व स्तनपान कर रहा है।
मैत्री हॉस्पिटल के निदेशक शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अशोक शारदा व पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. अशोक गोयल ने बुधवार को पत्रकारों को इसकी जानकारी दी। दोनों ने बताया कि रामगंजमंडी की रेखा का मोड़क स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव हुआ। बच्चा स्तनपान नहीं कर पा रहा था। सांस में भी तकलीफ थी। वे उसे मैत्री हॉस्पिटल लाए और जांचों में पता चला कि बच्चे के खाने की नली नहीं बनी थी, इसे प्योर इसोफेजियल अट्रेजिया कहते हैं।
दो बार में होती है सर्जरी
पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. गोयल ने बताया कि सामान्यतः इस बीमारी में बच्चे का जन्म के समय पहली और सालभर बाद दूसरी सर्जरी की जाती है। पहली सर्जरी में ऊपर की नली का हिस्सा गर्दन के बाहर बनाते हैं, जिससे वह जो भी खाता है वह गर्दन से बाहर आ जाता है तथा पेट में ऑपरेशन कर खाने की नली डाल दी जाती है। बच्चे को 1 साल तक इसी नली से खाद्य पदार्थ दिए जाते हैं। सालभर बाद दूसरा ऑपरेशन किया जाता है, जिसमें कि पेट (आमाशय) को छाती के द्वारा दिल के पीछे से लाकर गर्दन वाले छेद से जोड़ा जाता है।
यह था रिस्क फैक्टर
लेकिन इस केस में परिजनों से गहन चर्चा के बाद उनकी सहमति से एक बार में ही ऑपरेशन करने का निर्णय किया। जोखिम इसलिए ज्यादा था, क्योंकि बच्चा 24 घंटे पहले ही पैदा हुआ था और उसका वजन सिर्फ 2 किलो था। करीब 3 घंटे की सर्जरी में इसके पेट को छाती के माध्यम से दिल के पीछे से लेते हुए गर्दन में खाने की नली से जोड़ा गया। ऑपरेशन के बाद बच्चे को 24 घंटे शिशु रोग विशेषज्ञ की देखरेख में करीब 10 दिन तक वेंटीलेटर पर रखना पड़ा। अब बच्चा स्वस्थ है व स्तनपान कर रहा है।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai