वो छह घंटे सबसे बुरे थे भारत के लिए, भारतीय सेना भी थीं लाचार

वो छह घंटे सबसे बुरे थे भारत के लिए, भारतीय सेना भी थीं लाचार

वो छह घंटे सबसे बुरे थे भारत के लिए, भारतीय सेना भी थीं लाचार

 31 अक्टूबर 1984 के सुबह नौ से लेकर दोपहर तीन बजे तक का समय देश के इतिहास में सबसे ज्यादा मुसीबत वाला कहा जाता है। एक तरह से कहा जाए तो यह वह समय था जब भारत में संवैधानिक रूप से नेतृत्व का संकट खड़ा हो गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह विदेश यात्रा पर थे और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई थी।
उस दौरान संविधान के विशेषज्ञों ने जो राय जाहिर की थी उसके मुताबिक ऐसे हालात में हमारे देश की सीमाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित थीं। अगर कोई देश आक्रमण कर देता तो भारत की सेनाओं को जवाबी कार्रवाई करने का आदेश कौन देता। उस दिन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह को यमन से शाम तक वापस आना था और ये हादसा सुबह हो गया। एम्स के डॉक्टर गुलेरिया ने बताया था कि देखते ही लग गया था वह जीवित नहीं हैं। उसके बाद हमने इसकी पुष्टि के लिए ईसीजी की। उन्होंने वहां मौजूद स्वास्थ्य मंत्री शंकरानंद से पूछा कि अब क्या करना है? क्या मृत घोषित कर दें? उन्होंने कहा नहीं।
फिर ये खबर दी गई की इंदिराजी का ऑपरेशन चल रहा है
इंदिराजी को उनके अंगरक्षकों ने गोली मार दी है ये खबर दिल्ली में फैलते ही एम्स के बाहर हजारों की संख्या में लोग जमा हो गए। भीड़ को समझाया गया कि इंदिराजी का ऑपरेशन चल रहा है। लंबे समय तक इंदिराजी के सचिव रहे आरके धवन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि वह उस दिन एम्स, एयरपोर्ट और प्रधानमंत्री आवास के बीच चक्कर काट रहे थे। एक अजीब तरह का डर मन में सता रहा था। भारत उस दिन सबसे कठिन दौर से गुजरा था।
राजीव गांधी थे कलकत्ता में
इंदिराजी की हत्या वाले दिन राजीव गांधी कलकत्ता में थे। करीब साढ़े ग्यारह बजे उनसे तुरंत लौटने कहा गया। इधर, समय से पहले राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को भी भारत आने कहा गया। चार बजे के लगभग जब राष्ट्रपति आ गए। राजीव कलकत्ता से करीब एक घंटे पहले ही पहुंचे थे। राष्ट्रपति ने सबसे पहले देश के प्रधानमंत्री की शपथ दिलाई उसके बाद इंदिरा गांधी के निधन की अधिकृत घोषणा की गई।

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2 Comments

  1. Visitor Photo
    By : Amritlal

    Job

  2. Visitor Photo
    By : Devesh

    Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai

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