घड़ियाल सेंचुरी वाली चंबल में उतरने का सोचने भर से रूह कांप उठती है। कराइयों में धूप सेक रहे मगरमच्छों को देखकर सुरक्षित नाव में बैठने के बाद भी डर लगता है। लेकिन, 80 साल की बिरधी बाई जैसी कई बुजुर्ग महिलाएं इतनी मजबूर हैं कि उन्हें रोजीरोटी चलाने के लिए यह खतरा मोल लेना ही पड़ता है।
ट्यबाें से पार कर जंगल पहुंचती
250 फीट गहरी और 500 से 700 मीटर पाट वाली चंबल को वे ट्यबाें से पार कर जंगल पहुंचती हैं। यहां दिनभर लकड़ियां बीनकर शाम को वापस लौटती हैं। लकड़ी के गट्ठर भी ट्यूब से बांधकर किनारे लाए जाते हैं। संघर्ष यहीं खत्म नहीं होता। जिस उम्र में घुटने जवाब दे जाते हैं, उस उम्र में किनारे पर पहुंचने के बाद बिरधी बाई 50 किलो के गट्ठर को सिर पर लादकर खड़ी चढ़ाई चढ़कर एक किमी दूर घर पहुंचती हैं।
500 रुपए महीने पेंशन मिलती है
दूसरे दिन जाकर बाजार में इस गट्ठकर को बेचने पर 50 से 60 रुपए मिल पाते हैं। दरअसल, बिरधी बाई को सरकार से मात्र 500 रुपए महीने पेंशन मिलती है, जबकि उन पर विकलांग बहू-बेटे समेत पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। सरकार ने मकान बनाने के लिए जो 25 हजार रुपए दिए, उनमें तो बस दीवार ही खड़ी हो पाई। बिरधी बाई अपने को कोटिया भील का वंशज बताती हैं, जिनके नाम पर कोटा का नामकरण हुआ था।
ट्यबाें से पार कर जंगल पहुंचती
250 फीट गहरी और 500 से 700 मीटर पाट वाली चंबल को वे ट्यबाें से पार कर जंगल पहुंचती हैं। यहां दिनभर लकड़ियां बीनकर शाम को वापस लौटती हैं। लकड़ी के गट्ठर भी ट्यूब से बांधकर किनारे लाए जाते हैं। संघर्ष यहीं खत्म नहीं होता। जिस उम्र में घुटने जवाब दे जाते हैं, उस उम्र में किनारे पर पहुंचने के बाद बिरधी बाई 50 किलो के गट्ठर को सिर पर लादकर खड़ी चढ़ाई चढ़कर एक किमी दूर घर पहुंचती हैं।
500 रुपए महीने पेंशन मिलती है
दूसरे दिन जाकर बाजार में इस गट्ठकर को बेचने पर 50 से 60 रुपए मिल पाते हैं। दरअसल, बिरधी बाई को सरकार से मात्र 500 रुपए महीने पेंशन मिलती है, जबकि उन पर विकलांग बहू-बेटे समेत पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। सरकार ने मकान बनाने के लिए जो 25 हजार रुपए दिए, उनमें तो बस दीवार ही खड़ी हो पाई। बिरधी बाई अपने को कोटिया भील का वंशज बताती हैं, जिनके नाम पर कोटा का नामकरण हुआ था।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai