एक तरफ तो नगर निगम खुले में शौच करने वालों को समझाइश और पाबंद कर रहा है और दूसरी तरफ अभी तक विकल्प के रूप में कोई व्यवस्था नहीं है। शहर में 27 हजार से अधिक घर ऐसे हैं जिनमें टॉयलेट नहीं हैं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत सालभर में कोटा के 10 हजार लोगों ने टॉयलेट बनाने के लिए आवेदन किया।
क्या है हकीकत
उनमें से निगम ने 8 हजार की स्वीकृति भी जारी कर दी, 1900 लोगों के बैंक खाते में पहली किश्त पहुंच गई। यहां तक तो सब ठीक लगता है, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि एक साल में केवल 8 ही टॉयलेट बने हैं। टॉयलेट बनवाने के लिए 10 हजार लोगों ने निगम को आवेदन किए थे। इनमें से 8 हजार लोगों के आवेदन योग्य पाए गए और 2 हजार रिजेक्ट हो गए।
खाते में कितने डाले गए
पहले चरण में 1900 लोगों को पहली किश्त 4-4 हजार रुपए खाते में डाल दिए। पिछले दिनों जब निगम ने जब टॉयलेट का सर्वे किया तो पता चला कि इनमें से 350 लोग ऐसे थे जिनके खाते बैंक ने सीज कर दिए, 350 खाते पहले ही बंद हो जाने के कारण उनके खातों में पैसा नहीं पहुंचा। 357 टायलेट का काम चलता हुआ मिला। केवल 8 ही टॉयलेट पूरे बने हुए मिले। शेष 835 लोग राशि लेकर बैठ गए और उनके पास टॉयलेट बनाने की जगह ही नहीं है।
ये रही खामियां
- निगम ने पहले फाॅर्म तो भरवा लिए, लेकिन उन लोगों से ये नहीं पूछा कि उनके पास टाॅयलेट बनाने के लिए जगह भी है या नहीं।
-राशि दी, लेकिन मॉनिटरिंग नहीं की, राशि सीधे उन लोगों के खातों में डाल दी। कई लोग राशि लेकर बैठ गए।
गाइड लाइन बदल दी
नगर निगम के आयुक्त शिवप्रसाद एम नकाते ने कहा है कि इसी समस्या के समाधान के लिए अब गाइड लाइन बदल दी है। अब टॉयलेट के लिए फाॅर्म भरवाने से पहले उनसे पूछा जा रहा है कि टॉयलेट बनाने की जगह है या नहीं। बनाने का पैसा भी उन लोगों को नगद या बैंक खाते में नहीं दे रहे हैं। इसके लिए निर्माण कंपनी को बीच में ले रहे हैं। जो खुद उनके घर जाकर टॉयलेट बनाएगी। इसका पैसा कंपनी को दिया जाएगा। जिन लोगों के यहां टॉयलेट बनाने की जगह नहीं हैं ऐसे लोगों के लिए सामुदायिक टॉयलेट बनाए जाएंगे।
क्या है हकीकत
उनमें से निगम ने 8 हजार की स्वीकृति भी जारी कर दी, 1900 लोगों के बैंक खाते में पहली किश्त पहुंच गई। यहां तक तो सब ठीक लगता है, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि एक साल में केवल 8 ही टॉयलेट बने हैं। टॉयलेट बनवाने के लिए 10 हजार लोगों ने निगम को आवेदन किए थे। इनमें से 8 हजार लोगों के आवेदन योग्य पाए गए और 2 हजार रिजेक्ट हो गए।
खाते में कितने डाले गए
पहले चरण में 1900 लोगों को पहली किश्त 4-4 हजार रुपए खाते में डाल दिए। पिछले दिनों जब निगम ने जब टॉयलेट का सर्वे किया तो पता चला कि इनमें से 350 लोग ऐसे थे जिनके खाते बैंक ने सीज कर दिए, 350 खाते पहले ही बंद हो जाने के कारण उनके खातों में पैसा नहीं पहुंचा। 357 टायलेट का काम चलता हुआ मिला। केवल 8 ही टॉयलेट पूरे बने हुए मिले। शेष 835 लोग राशि लेकर बैठ गए और उनके पास टॉयलेट बनाने की जगह ही नहीं है।
ये रही खामियां
- निगम ने पहले फाॅर्म तो भरवा लिए, लेकिन उन लोगों से ये नहीं पूछा कि उनके पास टाॅयलेट बनाने के लिए जगह भी है या नहीं।
-राशि दी, लेकिन मॉनिटरिंग नहीं की, राशि सीधे उन लोगों के खातों में डाल दी। कई लोग राशि लेकर बैठ गए।
गाइड लाइन बदल दी
नगर निगम के आयुक्त शिवप्रसाद एम नकाते ने कहा है कि इसी समस्या के समाधान के लिए अब गाइड लाइन बदल दी है। अब टॉयलेट के लिए फाॅर्म भरवाने से पहले उनसे पूछा जा रहा है कि टॉयलेट बनाने की जगह है या नहीं। बनाने का पैसा भी उन लोगों को नगद या बैंक खाते में नहीं दे रहे हैं। इसके लिए निर्माण कंपनी को बीच में ले रहे हैं। जो खुद उनके घर जाकर टॉयलेट बनाएगी। इसका पैसा कंपनी को दिया जाएगा। जिन लोगों के यहां टॉयलेट बनाने की जगह नहीं हैं ऐसे लोगों के लिए सामुदायिक टॉयलेट बनाए जाएंगे।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai