मेडिकल कॉलेज ड्रग वेयर हाउस (एमसीडीडब्ल्यू) के मिस मैनेजमेंट के चलते तीनों अस्पतालों में 4 महीने से 100 से अधिक तरह की जरूरी दवाएं नहीं हैं। हालत ये है कि जुकाम और एलर्जी की टैबलेट्स समेत 2, 5 तथा 10 एमएल की सीरिंज तक भी रोगी को बाजार से लानी पड़ रही है। दूसरी ओर करीब 100 तरह की दवाइयां इतनी ज्यादा मात्रा में आ गईं कि आगामी 2-3 साल तक खत्म नहीं हो सकतीं।
क्या है इसकी वजह
इनको रखने की भी जगह नहीं बची है। इनके एक्सपायर होने का भी डर है, ऐसे में उन्हें बाहर भेजने की तैयारी चल रही है। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि अब मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में लगभग उतनी ही तरह की दवाइयां उपलब्ध हैं, जितनी गांवों के पीएचसी-सीएचसी पर मिलती हैं। 4 माह पहले तक एमबीएस, जेके लोन और नए अस्पताल में 529 तरह की दवाइयां मिलती थीं, लेकिन इस सारे मिस मैनेजमेंट की वजह से वर्तमान में सिर्फ 412 तरह की दवाइयां मिल रही हैं। वैसे आदर्श स्थिति यह है कि मेडिकल कॉलेज स्तर के अस्पतालों में 700 से ज्यादा तरह की दवाइयां उपलब्ध होनी चाहिए। क्योंकि यहां बहुत सारे विभाग चलते हैं और हर तरह के रोगी आते हैं।
जुकाम और हृदय रोग की दवाइयां नहीं
जुकाम की सिट्रेजीन, एलर्जी की सीपीएम, कुत्ते काटने पर लगाया जाने वाले रैबीज इंट्रामस्कुलर इंजेक्शन, मिडालोजाम इंजेक्शन, एंटीबायोटिक सैफ्टाजिडिम, डैक्सामेथाशोन इंजेक्शन, फेंटानिल सिट्रेट इंजेक्शन, हृदय रोग में प्रयुक्त इस्ट्रेप्टोकाइनेज इंजेक्शन, सिप्रोयलोक्सिन इंजेक्शन, पोवीडोन आयोडीन आईपी, दाद-खुजली की मिकोनाजोल नाइट्रेट क्रीम, जलने में प्रयुक्त सिल्वर सल्फाइडाइजिन क्रीम, मैथोट्रेक्सेट, फिनोफाइव्रेट कैप्सूल, मल्टीविटामिन टैबलेट, प्रोमोथाजिन इंजेक्शन, डिलटियाजैक टैबलेट आदि उपलब्ध नहीं है। ये सभी दवाएं ऐसी हैं जो रूटीन में काम आती हैं। इनके अलावा करीब 100 तरह की दवाइयां वे हैं, जो पहले उपलब्ध थीं, लेकिन अब नहीं मिल रहीं।
स्टॉक जरूरत से कहीं ज्यादा
मलेरिया में काम आने वाली मेफ्लोक्वीन टैबलेट, उल्टी की मेटोक्लोरप्रोपामाइड सिरप, प्रोमेथाजिन सिरप, एपिलेप्सी का फीनोवारवीटोम इंजेक्शन, सांस रोगों का पाउडर, एंटीबायोटिक सैफिपिम इंजेक्शन, पेट दर्द की डाइसाइक्लोक्विन सिरप, उल्टी के लिए डोमपेरिडॉन ड्रॉप्स, ऑपरेशन में यूज आने वाली अलग-अलग साइज की इंट्रोट्रेकियल ट्यूब, इंफेंट फीडिंग ट्यूब, अलग-अलग तरह के सक्शन कैथेटर, पिडियाट्रिक आईवी सेट, सेलाइन नेजल ड्रॉप, सांस की थियोफाइलाइन टैबलेट समेत कई दवाइयां सालाना डिमांड से कई गुना ज्यादा उपलब्ध हैं। इनकी वजह से मेडिकल कॉलेज के ड्रग वेयर हाउस में पैर रखने की जगह नहीं है। पहले ये दवाइयां बाहर जाएंगी, तब जाकर दूसरी दवाइयां मंगाई जाएंगी।
8 काउंटर पर टहलने के बाद 3 मिली
कोटा के कमलेश सेन को गर्मी के चलते स्किन प्रॉब्लम हुई तो एमबीएस में दिखाने पहुंचे। पर्ची कटवाने से लेकर ओपीडी में डॉक्टर को दिखाने तक में लगभग डेढ़ घंटे लगे। इसके बाद दवा काउंटर पर पहुंचे तो सभी 8 काउंटर पर पता किया तो एक ही काउंटर पर 4 में से 3 ही दवाएं मिलीं।
महंगी दवाओं की भी कमी
कैथून से आए गुलाम रसूल के पैर में लंबे समय से दिक्कत है। एमबीएस के ऑर्थोपेडिक डिपार्टमेंट में दिखाने आए रसूल को पूरी प्रक्रिया में लगभग 5 घंटे लग गए। दोपहर 1 बजे दवा काउंटर पर पहुंचे तो 3 में से 2 ही दवा मिली। सबसे महंगी दवा ही बजार से खरीदनी पड़ी।
क्या है इसकी वजह
इनको रखने की भी जगह नहीं बची है। इनके एक्सपायर होने का भी डर है, ऐसे में उन्हें बाहर भेजने की तैयारी चल रही है। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि अब मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में लगभग उतनी ही तरह की दवाइयां उपलब्ध हैं, जितनी गांवों के पीएचसी-सीएचसी पर मिलती हैं। 4 माह पहले तक एमबीएस, जेके लोन और नए अस्पताल में 529 तरह की दवाइयां मिलती थीं, लेकिन इस सारे मिस मैनेजमेंट की वजह से वर्तमान में सिर्फ 412 तरह की दवाइयां मिल रही हैं। वैसे आदर्श स्थिति यह है कि मेडिकल कॉलेज स्तर के अस्पतालों में 700 से ज्यादा तरह की दवाइयां उपलब्ध होनी चाहिए। क्योंकि यहां बहुत सारे विभाग चलते हैं और हर तरह के रोगी आते हैं।
जुकाम और हृदय रोग की दवाइयां नहीं
जुकाम की सिट्रेजीन, एलर्जी की सीपीएम, कुत्ते काटने पर लगाया जाने वाले रैबीज इंट्रामस्कुलर इंजेक्शन, मिडालोजाम इंजेक्शन, एंटीबायोटिक सैफ्टाजिडिम, डैक्सामेथाशोन इंजेक्शन, फेंटानिल सिट्रेट इंजेक्शन, हृदय रोग में प्रयुक्त इस्ट्रेप्टोकाइनेज इंजेक्शन, सिप्रोयलोक्सिन इंजेक्शन, पोवीडोन आयोडीन आईपी, दाद-खुजली की मिकोनाजोल नाइट्रेट क्रीम, जलने में प्रयुक्त सिल्वर सल्फाइडाइजिन क्रीम, मैथोट्रेक्सेट, फिनोफाइव्रेट कैप्सूल, मल्टीविटामिन टैबलेट, प्रोमोथाजिन इंजेक्शन, डिलटियाजैक टैबलेट आदि उपलब्ध नहीं है। ये सभी दवाएं ऐसी हैं जो रूटीन में काम आती हैं। इनके अलावा करीब 100 तरह की दवाइयां वे हैं, जो पहले उपलब्ध थीं, लेकिन अब नहीं मिल रहीं।
स्टॉक जरूरत से कहीं ज्यादा
मलेरिया में काम आने वाली मेफ्लोक्वीन टैबलेट, उल्टी की मेटोक्लोरप्रोपामाइड सिरप, प्रोमेथाजिन सिरप, एपिलेप्सी का फीनोवारवीटोम इंजेक्शन, सांस रोगों का पाउडर, एंटीबायोटिक सैफिपिम इंजेक्शन, पेट दर्द की डाइसाइक्लोक्विन सिरप, उल्टी के लिए डोमपेरिडॉन ड्रॉप्स, ऑपरेशन में यूज आने वाली अलग-अलग साइज की इंट्रोट्रेकियल ट्यूब, इंफेंट फीडिंग ट्यूब, अलग-अलग तरह के सक्शन कैथेटर, पिडियाट्रिक आईवी सेट, सेलाइन नेजल ड्रॉप, सांस की थियोफाइलाइन टैबलेट समेत कई दवाइयां सालाना डिमांड से कई गुना ज्यादा उपलब्ध हैं। इनकी वजह से मेडिकल कॉलेज के ड्रग वेयर हाउस में पैर रखने की जगह नहीं है। पहले ये दवाइयां बाहर जाएंगी, तब जाकर दूसरी दवाइयां मंगाई जाएंगी।
8 काउंटर पर टहलने के बाद 3 मिली
कोटा के कमलेश सेन को गर्मी के चलते स्किन प्रॉब्लम हुई तो एमबीएस में दिखाने पहुंचे। पर्ची कटवाने से लेकर ओपीडी में डॉक्टर को दिखाने तक में लगभग डेढ़ घंटे लगे। इसके बाद दवा काउंटर पर पहुंचे तो सभी 8 काउंटर पर पता किया तो एक ही काउंटर पर 4 में से 3 ही दवाएं मिलीं।
महंगी दवाओं की भी कमी
कैथून से आए गुलाम रसूल के पैर में लंबे समय से दिक्कत है। एमबीएस के ऑर्थोपेडिक डिपार्टमेंट में दिखाने आए रसूल को पूरी प्रक्रिया में लगभग 5 घंटे लग गए। दोपहर 1 बजे दवा काउंटर पर पहुंचे तो 3 में से 2 ही दवा मिली। सबसे महंगी दवा ही बजार से खरीदनी पड़ी।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai