सींता नहर में सोमवार रात बहे दिनेश मीणा को तलाशने में निगम के एक्सपर्ट गोताखोरों को 24 घंटे से ज्यादा का समय लग गया। 24 घंटे में 8 किलोमीटर दूर शव अपने आप फूलकर ऊपर आया तो शव निकाला। नहरों, नदी और नालाें से शव निकालने के दौरान ऐसा पहली बार नहीं हुआ, हर बार गोताखोर सिर्फ शव ऊपर आने पर ही निकालते हैं।
7 लोगों के शवों को निकाल रहे हैं
कोटा जिले में निगम व पुलिस जलस्रोतों से हर माह औसतन 7 लोगों के शवों को निकाल रहे हैं। यानी सालभर में गिरने, फिसलने या कूदने से 84 लोगों की मौत हो रही है। भास्कर ने जब एक्सपर्ट गोताखोरों से उनके इस फेल्योर पर सवाल पूछे तो सामने आया कि गोताखोर जुगाड़ की नाव और रस्सियों के बलबूते शवों को निकालते हैं।
बॉडी सर्च यूनिट ही नहीं है
कोई पानी के नीचे इसलिए नहीं जाता क्योंकि उनके पास ऐसे उपकरण (बॉडी सर्च यूनिट) ही नहीं हैं। गिनती की चार नावें कबाड़ या जर्जर हो चुकी हैं। तुरंत मौके तक पहुंचाने वाली गाड़ी के चारों टायर भी जुगाड़ पर चल रहे हैं।
स्किन प्रॉब्लम हो गई है
गोताखोट टीम का कहना है कि नाव टूटी है, वाहन खराब हैं और उपकरण तो सालों से नहीं हैं। हम बाइक से मौके पर जाते हैं। स्विम सूट नहीं होने से पानी से सभी गोताखोरों को स्किन प्रॉब्लम हो गई है। किसी के कान खराब हो गए तो किसी के हाथ, सिर व पैर में चोटें हैं। हम तो फिर भी सालभर में 15 लोगों की जान बचा लेते हैं।
289 करोड़ का बजट वाला निगम फेल
289 करोड़ के बजट वाला निगम पिछले 10 सालों से अपने गोताखोरों को उपकरण तक मुहैया नहीं करवा पा रहा। निगम सिर्फ आपदा प्रबंधन विभाग को पत्र लिखकर खानापूर्ती करता है। इधर, आपदा प्रबंधन विभाग लोगों की जान बचाने और शव निकालने को एसडीआरएफ (स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स) का काम बताकर निगम को बजट नहीं देता। निगम भी कभी गोताखोरों को अपनी तरफ से बजट मुहैया नहीं करवा पाया। जबकि, सिर्फ 9 करोड़ रुपए के उपकरण की डिमांड सालों से चली आ रही है।
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Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai