मैंने वर्ष 1985 से 1989 तक पढा हॅू, मैं तलवन्डी में रहता था, स्कूल के मैनेजर का नाम नहीं पता है लेकिन उनका सुशीला नर्सिग होम था, मेरी क्लास टीचर दीपा मैडम थी, मेरे क्लास का सबसे होशियार लडका शोपन जैन था, अब मैं कानपुर में रहता हॅू पर मुझे उस स्कूल की बहुत याद आती है, मुझे आज भी याद है कि मैं स्लेट पर पेन्सिल से लिखकर नकल ले गया था पर मेरे दोस्त ने मुझे पकडवा दिया और मेरे डैड को स्कूल बुलाया गया, मैं बहुत चोर था, स्कूल से बैट चुराया, शैतानी भी बहुत की, स्कूल में बचपन की बहुत सी शरारतें याद हैं जिन्हें सोचकर हॅसी आती है, आज मैं सरकारी नौकरी में हॅू,
मैंने वर्ष 1985 से 1989 तक पढा हॅू, मैं तलवन्डी में रहता था, स्कूल के मैनेजर का नाम नहीं पता है लेकिन उनका सुशीला नर्सिग होम था, मेरी क्लास टीचर दीपा मैडम थी, मेरे क्लास का सबसे होशियार लडका शोपन जैन था, अब मैं कानपुर में रहता हॅू पर मुझे उस स्कूल की बहुत याद आती है, मुझे आज भी याद है कि मैं स्लेट पर पेन्सिल से लिखकर नकल ले गया था पर मेरे दोस्त ने मुझे पकडवा दिया और मेरे डैड को स्कूल बुलाया गया, मैं बहुत चोर था, स्कूल से बैट चुराया, शैतानी भी बहुत की, स्कूल में बचपन की बहुत सी शरारतें याद हैं जिन्हें सोचकर हॅसी आती है, आज मैं सरकारी नौकरी में हॅू,