रोजाना की तरह बुधवार सुबह ऑफिस में मीटिंग से फ्री हुआ। मेरा असाइनमेंट था- आईएल कर्मचारियों के परिवारों की व्यथा। तभी रिसेप्शन से सूचना आई कि एक महिला मिलना चाहती है। देखा तो पहली नजर में ही लग गया कि वृद्धा कोई उम्मीद लेकर आई है।
बात शुरू की तो बताया कि बेटी की दोनों किडनी फेल हैं। दस्तावेज दिखाए और बोलीं- हमारी स्थिति अब ऐसी नहीं रही कि बेटी का इलाज करा पाएं। भास्कर हमेशा ऐसे परिवारों की मदद करता आया है, यदि हमारी भी कर दो तो...।
इलाज के रिकॉर्ड से पता चला कि दोनों किडनी जवाब दे चुकी हैं और हर सप्ताह 2 बार डायलिसिस की जरूरत है। फिर महिला से सवाल-जवाब किए और खबर के लिए जरूरी जानकारियां ली। महिला ने बताया कि वह महावीर नगर थर्ड में रहती हैं, बेटी वहीं है। मेरी बात अंतिम दौर में थी... तभी लैंग्वेज के बदलाव की वजह से मैंने पूछ लिया- आप लोग कहां से हो माताजी? यहां के तो नहीं लग रहे? जवाब था- बेटा!
बिहार के हैं और कई सालों से यहां हैं। यहां कैसे? तो बोली-पति आईएल (इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड) में थे, अब रिटायर हो चुके। एक बारगी मैंने लंबी सांस ली और कुछ देर चुप रहा। उन्हें नहीं पता था कि मैं इसी काम के लिए फील्ड में निकल रहा था। महिला की आंखें भर आईं, साथ आई महिला ने उन्हें संभाला। मैंने समझाया और कहा कि आप घर पहुंचिए, मैं वहीं आता हूं। उल्लेखनीय है कि 2009 में जो रिवाइवल पैकेज दिया, उससे कर्मचारियों का बकाया वेतन तक नहीं बंट पाया।
इलाज पर खर्च हर महीने 10 हजार, पेंशन मिलती है 500 का नोट
मैं और मेरे साथी फोटो जर्नलिस्ट महावीर नगर थर्ड में कृष्ण शर्मा के मकान पर पहुंचे। बमुश्किल साढ़े 11 बाई 35 का मकान होगा। गेट खुलते ही कृष्ण शर्मा और उनकी पत्नी फूलेश्वरी आई। एक संकरे कमरे में बैठाया और बोले- बेटी रेणु (25) को लाते हैं। दोनों पकड़कर बेटी को लाए, बैठाया। फोटो के लिए लेटने को कहा तो बेटी ने मना कर दिया, बोलीं- सांस लेने में दिक्कत होती है। अब मेरी बात शुरू हुई रेणु के पिता कृष्ण शर्मा से।
कब रिटायर हुए थे? जवाब मिला- 2003 में। फिर यह स्थितियां कैसे? तो वे थोड़े झल्लाते हुए बोले- अब क्या-क्या बताऊं? डेढ़ साल से रेणु की यही स्थिति है। उसे बचाने के लिए हर माह 8 बार डायलिसिस जरूरी है, 10-12 हजार का खर्च आता है। ब्लड और दवाइयां भी आती हैं। पेंशन कितनी मिलती है? जवाब था- 500 रुपए। अब मेरी स्थिति सवाल करने जैसी नहीं थी। खुद बोलने लगे- भइया, आज तक संशोधित वेतनमान का पैसा नहीं मिला।
अब कोई उम्मीद भी नहीं है। रिटायरमेंट के वक्त जो पैसा मिला, वह कभी का इसके इलाज पर खर्च हो चुका। लाख-डेढ़ लाख का कर्ज और चढ़ गया। कुछ पैसा इसकी शादी के लिए भी जमा कर रखा था... सब खत्म..। अभी अहमदाबाद का ट्रीटमेंट चल रहा है। बड़ा बेटा कोचिंग में 5 हजार रुपए माह की जॉब करता है, इसी से घर चलता है।
अब लगता है कि मैंने जिंदगी उस कंपनी में खपा दी, जिसकी नजर में मेरी जिंदगी का कोई मोल ही नहीं था। आप खुद देख लो- यदि ऐसे वक्त में सरकार मुझे मेरा पैसा नहीं दे रही तो क्या मरने के बाद देगी? साथ बैठी मां ने रेणु की पुरानी तस्वीर दिखाई और बोली- देखो, कैसी दिखती थी मेरी रेणु, बीएड कर रखी है इसने, लेकिन क्या बताऊं...?
बात शुरू की तो बताया कि बेटी की दोनों किडनी फेल हैं। दस्तावेज दिखाए और बोलीं- हमारी स्थिति अब ऐसी नहीं रही कि बेटी का इलाज करा पाएं। भास्कर हमेशा ऐसे परिवारों की मदद करता आया है, यदि हमारी भी कर दो तो...।
इलाज के रिकॉर्ड से पता चला कि दोनों किडनी जवाब दे चुकी हैं और हर सप्ताह 2 बार डायलिसिस की जरूरत है। फिर महिला से सवाल-जवाब किए और खबर के लिए जरूरी जानकारियां ली। महिला ने बताया कि वह महावीर नगर थर्ड में रहती हैं, बेटी वहीं है। मेरी बात अंतिम दौर में थी... तभी लैंग्वेज के बदलाव की वजह से मैंने पूछ लिया- आप लोग कहां से हो माताजी? यहां के तो नहीं लग रहे? जवाब था- बेटा!
बिहार के हैं और कई सालों से यहां हैं। यहां कैसे? तो बोली-पति आईएल (इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड) में थे, अब रिटायर हो चुके। एक बारगी मैंने लंबी सांस ली और कुछ देर चुप रहा। उन्हें नहीं पता था कि मैं इसी काम के लिए फील्ड में निकल रहा था। महिला की आंखें भर आईं, साथ आई महिला ने उन्हें संभाला। मैंने समझाया और कहा कि आप घर पहुंचिए, मैं वहीं आता हूं। उल्लेखनीय है कि 2009 में जो रिवाइवल पैकेज दिया, उससे कर्मचारियों का बकाया वेतन तक नहीं बंट पाया।
इलाज पर खर्च हर महीने 10 हजार, पेंशन मिलती है 500 का नोट
मैं और मेरे साथी फोटो जर्नलिस्ट महावीर नगर थर्ड में कृष्ण शर्मा के मकान पर पहुंचे। बमुश्किल साढ़े 11 बाई 35 का मकान होगा। गेट खुलते ही कृष्ण शर्मा और उनकी पत्नी फूलेश्वरी आई। एक संकरे कमरे में बैठाया और बोले- बेटी रेणु (25) को लाते हैं। दोनों पकड़कर बेटी को लाए, बैठाया। फोटो के लिए लेटने को कहा तो बेटी ने मना कर दिया, बोलीं- सांस लेने में दिक्कत होती है। अब मेरी बात शुरू हुई रेणु के पिता कृष्ण शर्मा से।
कब रिटायर हुए थे? जवाब मिला- 2003 में। फिर यह स्थितियां कैसे? तो वे थोड़े झल्लाते हुए बोले- अब क्या-क्या बताऊं? डेढ़ साल से रेणु की यही स्थिति है। उसे बचाने के लिए हर माह 8 बार डायलिसिस जरूरी है, 10-12 हजार का खर्च आता है। ब्लड और दवाइयां भी आती हैं। पेंशन कितनी मिलती है? जवाब था- 500 रुपए। अब मेरी स्थिति सवाल करने जैसी नहीं थी। खुद बोलने लगे- भइया, आज तक संशोधित वेतनमान का पैसा नहीं मिला।
अब कोई उम्मीद भी नहीं है। रिटायरमेंट के वक्त जो पैसा मिला, वह कभी का इसके इलाज पर खर्च हो चुका। लाख-डेढ़ लाख का कर्ज और चढ़ गया। कुछ पैसा इसकी शादी के लिए भी जमा कर रखा था... सब खत्म..। अभी अहमदाबाद का ट्रीटमेंट चल रहा है। बड़ा बेटा कोचिंग में 5 हजार रुपए माह की जॉब करता है, इसी से घर चलता है।
अब लगता है कि मैंने जिंदगी उस कंपनी में खपा दी, जिसकी नजर में मेरी जिंदगी का कोई मोल ही नहीं था। आप खुद देख लो- यदि ऐसे वक्त में सरकार मुझे मेरा पैसा नहीं दे रही तो क्या मरने के बाद देगी? साथ बैठी मां ने रेणु की पुरानी तस्वीर दिखाई और बोली- देखो, कैसी दिखती थी मेरी रेणु, बीएड कर रखी है इसने, लेकिन क्या बताऊं...?
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai