भास्कर की पॉलीथिन मुक्त शहर की मुहिम से अब आम लोग जागरूक होने लगे हैं। पाटनपोल में दूध व्यवसायी अनिल खंडेलवाल लालाजी ने इस मुहिम से प्रेरित होकर एक हफ्ते में अपने ग्राहकों को 600 स्टील की केटलियां मुफ्त में बांट दीं। अब ग्राहक भी केटलियों में ही दूध ले जाते हैं।
खंडेलवाल ने बताया कि दुकान पर दिन भर दूध के साथ पॉलीथिन मांगते थे। भास्कर ने मुहिम चलाई तो खंडेलवाल भी ग्राहकों को पॉलीथिन के नुकसान बताकर जागरूक करने लगे। इससे कई लोगों की समझ में आ गया, फिर भी कुछ ऐसे थे जो बर्तन लाते ही नहीं थे। ऐसे लोगों के लिए उपाय निकाला कि उन्हें स्टील की केटली ही दे दी जाए। अब ग्राहक पॉलीथिन मांगने की बजाय घर से केटली लेकर आते हैं। उनका टारगेट 1 हजार केटलियां बांटने का है।
गायों की मौत से दुखी थे, निकाला स्थायी समाधान
खंडेलवाल बताते हैं कि उनकी दुकान पर हर दिन 5 से 6 किलो पॉलीथिन की खपत होती थी। आस-पड़ोस में रहने वाले भी घर से बर्तन लाने की बजाय खाली हाथ दूध लेने आ जाते थे और पॉलीथिन में दूध मांगते थे। भास्कर में पॉलीथिन के नुकसान के बारे पढ़ा तो मन काफी विचलित रहता था कि इस पॉलीथिन के जहर को कैसे रोका जाए। लोगों को समझाया कि पॉलीथिन गायों की तो जान ले ही रही है तुम्हारे बच्चों को भी नुकसान पहुंचा रही है। इसका असर तो हुआ, लेकिन पॉलीथिन की खपत फिर भी हो रही थी।
फिर स्टील की केटली बांटने का विचार आया। ग्राहकों के हिसाब से 1, 2 व 3 किलो क्षमता वाली स्टील की केटलियां खरीदीं। अब पॉलीथिन की खपत में 60 प्रतिशत की कमी आ गई। अगले एक हफ्ते में पॉलीथिन में दूध देना पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा।
दूसरे डेयरी संचालक भी अपनाएं, नुकसान की बजाय फायदा ही होगा
खंडेलवाल बताते हैं कि दूध की एक थैली की कीमत करीब 75 पैसे पड़ती है। ऐसे में यदि हर दिन 1000 थैली की खपत होती है तो हर दिन पॉलीथिन का खर्च 750 रुपए हुआ। केटली खरीदने में करीब 40 हजार रुपए का खर्च आएगा। ऐसे में यदि 53 दिन तक पॉलीथिन नहीं देनी पड़ी तो केटली के बराबर का खर्च बच जाएगा। इससे व्यवसाय पर अतिरिक्त खर्च नहीं पड़ेगा बल्कि बचत होगी और पॉलीथिन रूपी जहर से मुक्ति मिल जाएगी।
खंडेलवाल ने बताया कि दुकान पर दिन भर दूध के साथ पॉलीथिन मांगते थे। भास्कर ने मुहिम चलाई तो खंडेलवाल भी ग्राहकों को पॉलीथिन के नुकसान बताकर जागरूक करने लगे। इससे कई लोगों की समझ में आ गया, फिर भी कुछ ऐसे थे जो बर्तन लाते ही नहीं थे। ऐसे लोगों के लिए उपाय निकाला कि उन्हें स्टील की केटली ही दे दी जाए। अब ग्राहक पॉलीथिन मांगने की बजाय घर से केटली लेकर आते हैं। उनका टारगेट 1 हजार केटलियां बांटने का है।
गायों की मौत से दुखी थे, निकाला स्थायी समाधान
खंडेलवाल बताते हैं कि उनकी दुकान पर हर दिन 5 से 6 किलो पॉलीथिन की खपत होती थी। आस-पड़ोस में रहने वाले भी घर से बर्तन लाने की बजाय खाली हाथ दूध लेने आ जाते थे और पॉलीथिन में दूध मांगते थे। भास्कर में पॉलीथिन के नुकसान के बारे पढ़ा तो मन काफी विचलित रहता था कि इस पॉलीथिन के जहर को कैसे रोका जाए। लोगों को समझाया कि पॉलीथिन गायों की तो जान ले ही रही है तुम्हारे बच्चों को भी नुकसान पहुंचा रही है। इसका असर तो हुआ, लेकिन पॉलीथिन की खपत फिर भी हो रही थी।
फिर स्टील की केटली बांटने का विचार आया। ग्राहकों के हिसाब से 1, 2 व 3 किलो क्षमता वाली स्टील की केटलियां खरीदीं। अब पॉलीथिन की खपत में 60 प्रतिशत की कमी आ गई। अगले एक हफ्ते में पॉलीथिन में दूध देना पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा।
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खंडेलवाल बताते हैं कि दूध की एक थैली की कीमत करीब 75 पैसे पड़ती है। ऐसे में यदि हर दिन 1000 थैली की खपत होती है तो हर दिन पॉलीथिन का खर्च 750 रुपए हुआ। केटली खरीदने में करीब 40 हजार रुपए का खर्च आएगा। ऐसे में यदि 53 दिन तक पॉलीथिन नहीं देनी पड़ी तो केटली के बराबर का खर्च बच जाएगा। इससे व्यवसाय पर अतिरिक्त खर्च नहीं पड़ेगा बल्कि बचत होगी और पॉलीथिन रूपी जहर से मुक्ति मिल जाएगी।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai