मकर संक्रांति पर हमें मगरमच्छ से जुड़ी 3 खबरें मिलीं। इनमें से पहली हमारी समृद्ध संस्कृति बता रही है। जिसमें वन्य जीवों को भी ईश्वर का रूप मानकर पूजने का संदेश है। दूसरी दो खबरें वन विभाग के घड़ियाली आंसू बता रही हैं। पहले मामले में विभाग की लापरवाही से जबड़ा कटने के बाद मगरमच्छ मौत से संघर्ष कर रहा है और विभाग उसकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करवा सका है।
दूसरी हमसे-आपसे जुड़ी है, जिसमें चंबल गार्डन के किनारे नदी में लगाने के लिए आए 18 लाख के 2 फ्लोटिंग फाउंटेन बेकार पड़े हैं। इन्हें घड़ियाल सेंचुरी की बेहतरी का हवाला देकर लगाने की अनुमति नहीं दी जा रही है, जबकि इसी क्षेत्र में बोटिंग होती है।
आस्था: ईश्वर का रूप मानकर पूजा करता है बंगाली समाज
बंगाली समाज ने रोझड़ी में 24 फीट लंबे मिट्टी के मगरमच्छ की पूजा कर मकर संक्रांति मनाई। इसके लिए समाज के लोग सुबह 8 बजे से ही जुटे रहे। साढ़े 3 फीट का मुंह बनाया। जबड़े पर 44 दांत बनाए गए। इसके बाद ढोल ताशों के साथ पूजा की गई। शाम को मंत्रोच्चार के साथ विसर्जन हुआ। संक्रांति पर विशेष तौर पर चावल के बने व्यंजन बनाए गए।
नर्मदा का वाहन है मगरमच्छ: बंगाली समाज के प्रदीप मंडल ने बताया कि कि पुराने समय में एक महात्मा थे। वो कोई भी रूप धारण कर सकते थे। पत्नी को उनके इस चमत्कार पर विश्वास नहीं था। एक दिन पत्नी ने उनसे कहा कि वो मगरमच्छ का रूप धारण करके दिखाएं। महात्मा ने कहा कि ये जल से भरा लौटा लो।
रूप धारण करने के बाद इसे मेरे शरीर पर छिड़क देना ताकि मैं मूल स्वरूप में आ सकूं। महात्मा ने जब मगरमच्छ का रूप किया तो पत्नी डर गई और हाथ से जल से भरा लोटा छूट गया। ऐसे में महात्मा मगरमच्छ बन गए। मगरमच्छ बनने के बाद शिव की पुत्री नर्मदा ने इसे अपना वाहन बनाया तभी से मकर संक्रांति पर बंगाली समाज मगरमच्छ का पूजन करता है।
लापरवाही: 8 दिन में भी दर्ज नहीं हुई घायल मगरमच्छ की रिपोर्ट
बोरखेड़ा में 8 जनवरी को पकड़े गए मगरमच्छ की हालत गंभीर है। बस्ती में किसी ने उस पर कुल्हाड़ी से हमला कर दिया था। इससे उसका ऊपरी जबड़ा अलग हो गया है। पहले तो बार-बार सूचना देने के बावजूद वन विभाग की टीम उसे पकड़ने के लिए समय से नहीं पहुंची। अब घटना के 8 दिन बाद भी वन विभाग ने न तो खुद हमला करने की रिपोर्ट दर्ज की न ही थाने में दर्ज करवाई।
खाना भी नहीं खा पा रहा: चिड़ियाघर में बंद मगरमच्छ की हालत इतनी गंभीर है कि उसे लकड़ी के सहारे मछलियां खिलाई जा रही हैं। इतनी गंभीर हालत के बावजूद चिड़ियाघर प्रशासन उसे प्राकृतिक आवास में छोड़ने की योजना बना रहा है। चिड़ियाघर इंचार्ज दीपक जासू ने बताया कि उच्चाधिकारियों की अनुमति मिलने के बाद इसे चंबल में छोड़ दिया जाएगा।
डॉ. कृष्णेंद्र सिंह नामा के अनुसार ऐसी हालत में मगरमच्छ को प्राकृतिक आवास में छोड़ने से इसे बड़े शिकार करने में दिक्कत आएगी। हालांकि ये छोटी मछलियों का शिकार कर जीवित रह सकता है, लेकिन कब तक ये कहना मुश्किल है।
मनमानी: बोटिंग से घड़ियाल को खतरा नहीं, फाउंटेन चलेंगे तो खतरा
चंबल नदी में बोटिंग हो सकती है, मिनी अकेलगढ़ प्लांट लग सकता है, अवैध निर्माण और मछलियों का शिकार हो सकता है, लेकिन सौंदर्यीकरण के लिए 2 फाउंटेन लगाने से वन विभाग को आपत्ति है। परमिशन न देने के पीछे कुतर्क दिया जा रहा है कि फाउंटेन चलने से घड़ियालों की सेहत पर असर पड़ेगा। ये फाउंटेन नदी में किनारे वाली साइड पर लगाए जाने थे।
निगम ने 18 लाख के दो फाउंटेन मंगवा लिए, लेकिन लगाने से पहले ही वन्यजीव विभाग ने आपत्ति लगा दी कि ये घड़ियाल सेंचुरी का क्षेत्र है और यहां बिना परमिशन के कुछ नहीं किया जा सकता है। नगर निगम ने परमिशन के लिए आवेदन किया तो ये कहते हुए परमिशन नहीं दी कि फाउंटेन से घड़ियालों को नुकसान पहुंचेगा।
हैंगिंग ब्रिज बनाना पड़ा, 48 जानें गई थी: घड़ियाल सेंचुरी के नाम पर वन्य जीव विभाग विकास व सौंदर्यीकरण के प्रोजेक्ट हमेशा से अटकाता आया है। बाईपास के लिए चंबल नदी पर ब्रिज पर बनाना था, लेकिन पिलर ब्रिज को अनुमति नहीं दी। इसके चलते हैंगिंग ब्रिज बनाना पड़ा। इसी हैंगिंग ब्रिज का एक हिस्सा निर्माण के दौरान गिर गया था, जिसमें 48 लोगों की मौत हो गई थी।
यह हठधर्मिता नहीं, बल्कि सरासर अंधेरगर्दी है
वन विभाग घड़ियाल सेंचुरी का हवाला देकर जिस इलाके में फ्लोटिंग फाउंटेन लगाने की इजाजत नहीं दे रहा वहीं थर्मल का गरम पानी और शहर के गंदे नाले जहर घोलते हैं। नदी के बीच खड़े मिनी अकेलगढ़ के हैवी पंप 24 घंटे पानी उठाते रहते हैं। यहां तक कि कुछ दिन पहले थर्मल से तेल के रिसाव के बाद भी वन विभाग के अधिकारियों ने रिपोर्ट तक दर्ज करवाना मुनासिब नहीं समझा। यहां पेट्रोल से नावें भी दौड़ती हैं। जब यह सब हो रहा है तो पानी में ऑक्सीजन घोलने वाले फव्वारे कैसे खतरनाक हो सकते हैं। 21वीं सदी में ऐसी रोड़ेबाजी नियमों का पालन कम अंधेरगर्दी ज्यादा है।
दूसरी हमसे-आपसे जुड़ी है, जिसमें चंबल गार्डन के किनारे नदी में लगाने के लिए आए 18 लाख के 2 फ्लोटिंग फाउंटेन बेकार पड़े हैं। इन्हें घड़ियाल सेंचुरी की बेहतरी का हवाला देकर लगाने की अनुमति नहीं दी जा रही है, जबकि इसी क्षेत्र में बोटिंग होती है।
आस्था: ईश्वर का रूप मानकर पूजा करता है बंगाली समाज
बंगाली समाज ने रोझड़ी में 24 फीट लंबे मिट्टी के मगरमच्छ की पूजा कर मकर संक्रांति मनाई। इसके लिए समाज के लोग सुबह 8 बजे से ही जुटे रहे। साढ़े 3 फीट का मुंह बनाया। जबड़े पर 44 दांत बनाए गए। इसके बाद ढोल ताशों के साथ पूजा की गई। शाम को मंत्रोच्चार के साथ विसर्जन हुआ। संक्रांति पर विशेष तौर पर चावल के बने व्यंजन बनाए गए।
नर्मदा का वाहन है मगरमच्छ: बंगाली समाज के प्रदीप मंडल ने बताया कि कि पुराने समय में एक महात्मा थे। वो कोई भी रूप धारण कर सकते थे। पत्नी को उनके इस चमत्कार पर विश्वास नहीं था। एक दिन पत्नी ने उनसे कहा कि वो मगरमच्छ का रूप धारण करके दिखाएं। महात्मा ने कहा कि ये जल से भरा लौटा लो।
रूप धारण करने के बाद इसे मेरे शरीर पर छिड़क देना ताकि मैं मूल स्वरूप में आ सकूं। महात्मा ने जब मगरमच्छ का रूप किया तो पत्नी डर गई और हाथ से जल से भरा लोटा छूट गया। ऐसे में महात्मा मगरमच्छ बन गए। मगरमच्छ बनने के बाद शिव की पुत्री नर्मदा ने इसे अपना वाहन बनाया तभी से मकर संक्रांति पर बंगाली समाज मगरमच्छ का पूजन करता है।
लापरवाही: 8 दिन में भी दर्ज नहीं हुई घायल मगरमच्छ की रिपोर्ट
बोरखेड़ा में 8 जनवरी को पकड़े गए मगरमच्छ की हालत गंभीर है। बस्ती में किसी ने उस पर कुल्हाड़ी से हमला कर दिया था। इससे उसका ऊपरी जबड़ा अलग हो गया है। पहले तो बार-बार सूचना देने के बावजूद वन विभाग की टीम उसे पकड़ने के लिए समय से नहीं पहुंची। अब घटना के 8 दिन बाद भी वन विभाग ने न तो खुद हमला करने की रिपोर्ट दर्ज की न ही थाने में दर्ज करवाई।
खाना भी नहीं खा पा रहा: चिड़ियाघर में बंद मगरमच्छ की हालत इतनी गंभीर है कि उसे लकड़ी के सहारे मछलियां खिलाई जा रही हैं। इतनी गंभीर हालत के बावजूद चिड़ियाघर प्रशासन उसे प्राकृतिक आवास में छोड़ने की योजना बना रहा है। चिड़ियाघर इंचार्ज दीपक जासू ने बताया कि उच्चाधिकारियों की अनुमति मिलने के बाद इसे चंबल में छोड़ दिया जाएगा।
डॉ. कृष्णेंद्र सिंह नामा के अनुसार ऐसी हालत में मगरमच्छ को प्राकृतिक आवास में छोड़ने से इसे बड़े शिकार करने में दिक्कत आएगी। हालांकि ये छोटी मछलियों का शिकार कर जीवित रह सकता है, लेकिन कब तक ये कहना मुश्किल है।
मनमानी: बोटिंग से घड़ियाल को खतरा नहीं, फाउंटेन चलेंगे तो खतरा
चंबल नदी में बोटिंग हो सकती है, मिनी अकेलगढ़ प्लांट लग सकता है, अवैध निर्माण और मछलियों का शिकार हो सकता है, लेकिन सौंदर्यीकरण के लिए 2 फाउंटेन लगाने से वन विभाग को आपत्ति है। परमिशन न देने के पीछे कुतर्क दिया जा रहा है कि फाउंटेन चलने से घड़ियालों की सेहत पर असर पड़ेगा। ये फाउंटेन नदी में किनारे वाली साइड पर लगाए जाने थे।
निगम ने 18 लाख के दो फाउंटेन मंगवा लिए, लेकिन लगाने से पहले ही वन्यजीव विभाग ने आपत्ति लगा दी कि ये घड़ियाल सेंचुरी का क्षेत्र है और यहां बिना परमिशन के कुछ नहीं किया जा सकता है। नगर निगम ने परमिशन के लिए आवेदन किया तो ये कहते हुए परमिशन नहीं दी कि फाउंटेन से घड़ियालों को नुकसान पहुंचेगा।
हैंगिंग ब्रिज बनाना पड़ा, 48 जानें गई थी: घड़ियाल सेंचुरी के नाम पर वन्य जीव विभाग विकास व सौंदर्यीकरण के प्रोजेक्ट हमेशा से अटकाता आया है। बाईपास के लिए चंबल नदी पर ब्रिज पर बनाना था, लेकिन पिलर ब्रिज को अनुमति नहीं दी। इसके चलते हैंगिंग ब्रिज बनाना पड़ा। इसी हैंगिंग ब्रिज का एक हिस्सा निर्माण के दौरान गिर गया था, जिसमें 48 लोगों की मौत हो गई थी।
यह हठधर्मिता नहीं, बल्कि सरासर अंधेरगर्दी है
वन विभाग घड़ियाल सेंचुरी का हवाला देकर जिस इलाके में फ्लोटिंग फाउंटेन लगाने की इजाजत नहीं दे रहा वहीं थर्मल का गरम पानी और शहर के गंदे नाले जहर घोलते हैं। नदी के बीच खड़े मिनी अकेलगढ़ के हैवी पंप 24 घंटे पानी उठाते रहते हैं। यहां तक कि कुछ दिन पहले थर्मल से तेल के रिसाव के बाद भी वन विभाग के अधिकारियों ने रिपोर्ट तक दर्ज करवाना मुनासिब नहीं समझा। यहां पेट्रोल से नावें भी दौड़ती हैं। जब यह सब हो रहा है तो पानी में ऑक्सीजन घोलने वाले फव्वारे कैसे खतरनाक हो सकते हैं। 21वीं सदी में ऐसी रोड़ेबाजी नियमों का पालन कम अंधेरगर्दी ज्यादा है।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai