बिलों पर लिख दिए जेनेरिक नाम, पता नहीं चल रही दवाओं की सही कीमत

बिलों पर लिख दिए जेनेरिक नाम, पता नहीं चल रही दवाओं की सही कीमत

बिलों पर लिख दिए जेनेरिक नाम, पता नहीं चल रही दवाओं की सही कीमत

मेडिकल कॉलेज के तीनों अस्पतालों में बीपीएल रोगियों की दवा खरीद में बड़ा घपला मिला है। बाजार से खरीदी जा रही दवाइयों के बिल जेनेरिक नाम से दिए जा रहे हैं। इनसे यह पता ही नहीं चल सकता कि दवा न्यूनतम दर पर की खरीदी गई या अधिकतम दर की। फर्मों से अनुबंध में भी गड़बड़ी पाई गई है।
नियमों की अवहेलना करते हुए जिले से बाहर की फर्मों से भी अनुबंध कर लिया गया। इसके अलावा टेंडर केवल एमबीएस अस्पताल के लिए हुआ, लेकिन उसी टेंडर पर जेके लोन और नए अस्पताल में भी दवा सप्लाई होती रही। इस वित्तीय अनियमितता का खुलासा तब हुआ, जब मुख्यमंत्री बीपीएल जीवन रक्षा कोष की निदेशक सुरभि भार्गव ने 2 दिन तक कोटा में रहकर तीनों अस्पतालों के बीपीएल काउंटरों का बारीकी से निरीक्षण किया।
हाल ही में उन्होंने अपनी रिपोर्ट मेडिकल कॉलेज प्रशासन और तीनों अस्पतालों को भिजवाई है, जिसमें सरकार व अस्पतालों को व्यवस्थाओं में कई तरह के बदलाव के लिए सुझाव भी दिए गए हैं। भार्गव ने 4 नवंबर को एमबीएस व जेके लोन तथा 5 नवंबर को नए अस्पताल के बीपीएल काउंटरों का निरीक्षण किया था। भास्कर के पास इस निरीक्षण की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट है, जिसमें गरीबों के इलाज के नाम पर चल रहे घालमेल में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं।
एमबीएस हॉस्पिटल के अधीक्षक डॉक्टर विजय सरदाना ने बताया कि मैं अभी जयपुर आया हुआ हूं। रिपोर्ट देखकर ही आपको कुछ बता पाऊंगा। वैसे हम पहले से इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं कि व्यवस्था में बदलाव हो। फर्मों से अनुबंध की जहां तक बात है, ये मेरे ज्वॉइन करने से काफी पहले के हैं।
बीपीएल काउंटर पर दवा उपलब्ध नहीं होने पर बाजार से दवा खरीदने का प्रावधान है। लेकिन, तीनों चिकित्सालयों में बीपीएल काउंटर पर दवा नहीं होने पर जन औषधि भंडार से एमआरपी पर दवा खरीदी जाती है। जबकि नियमानुसार स्थानीय बाजार में उपलब्ध दवा विक्रेताओं से निविदा प्रक्रिया कर आवश्यकता के अनुसार दैनिक आपूर्ति के लिए दवा मंगवाई जानी चाहिए। जन औषधि भंडार से उपलब्ध कराए गए बिलों में दवा का जेनेरिक नाम अंकित किया जाता है, जिससे यह पता नहीं चलता कि दवा अधिकतम दर पर खरीदी गई या न्यूनतम दर पर।
नियम सालभर का, फर्मों को दे दिया 2 साल का ठेका
तीनों अस्पतालों में बाजार की दवाइयों के लिए वर्ष 2013-14 में निविदा की गई और 6 फर्मों से 2 वर्ष के लिए अनुबंध कर लिया गया। इनमें एक फर्म तो उदयपुर की भी थी, जो कि सरासर गलत है। सामान्य वित्तीय एवं लेखा नियम (जीएफ एंड आर रूल्स) के तहत निविदा 1 साल के लिए ही की जाती है। आवश्यकता होने पर 6 माह के लिए समय बढ़ाया जा सकता है। निविदा एमबीएस ने की, उन्हीं से जेके लोन व न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल भी दवाएं खरीदते रहे। दोनों अस्पतालों ने अलग से कोई निविदा नहीं की। इंप्लांट खरीद में भी ठीक ऐसी ही गड़बड़ी मिली।

प्राइवेट अस्पताल में एक भी रोगी नहीं किया रेफर

तीनों अस्पताल ने कोई भी मरीज निजी चिकित्सालय, एम्स दिल्ली या पीजीआई चंडीगढ़ में रेफर नहीं किया। जबकि राज्य सरकार से अनुमोदित चिकित्सालयों में 5 बीपीएल रोगियों को निशुल्क उपचार के लिए रेफर किए जाने का प्रावधान है। एमबीएस में सितंबर, 2015 में सिर्फ ऑर्थोपेडिक विभाग के इंप्लांट्स के लिए ही टेंडर किया, सर्जरी व न्यूरो सर्जरी विभाग के इंप्लांट्स के लिए कोई टेंडर नहीं किया गया। बजट खत्म होने के बाद डिमांड भी समय पर सरकार को नहीं भेजी जा रही। बीपीएल काउंटरों पर पीला रंग होना चाहिए, लेकिन कहीं भी नहीं मिला।

क्या है जेनेरिक दवा

हर दवा का अपना साल्ट होता है, यही साल्ट उसका जेनेरिक नाम भी हो जाता है। वहीं, ब्रांडेड कंपनियां सहूलियत के हिसाब से नाम तय कर लेती हैं, ये ब्रांड नेम बन जाते हैं। दवा की क्षमता और तत्व दोनों में समान ही रहते हैं। एक ही साल्ट की टैबलेट 1 रुपए की भी आती है और 10 की भी।

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2 Comments

  1. Visitor Photo
    By : Amritlal

    Job

  2. Visitor Photo
    By : Devesh

    Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai

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