बॉयोलॉजिकल पार्क का मामला एक बार फिर अटक गया है। जिला प्रशासन ने नांता के ट्रेचिंग ग्राउंड को शिफ्ट करने से हाथ खड़े कर दिए हैं। इसके पीछे उसका तर्क है कि ट्रेचिंग ग्राउंड के लिए जमीन ही नहीं मिल रही है। ऐसे में बॉयोलॉजिकल पार्क के लिए ही नई जगह की तलाश करनी पड़ेगी।
इसके लिए कलेक्टर रवि कुमार सुरपुर ने बॉयोलॉजिकल पार्क बनाने का वैकल्पिक रास्ता निकालने के लिए वन विभाग के पीसीसीफ को चिट्ठी लिखी है। ताकि जिला प्रशासन, नगर निगम और वन विभाग के अधिकारी मिलकर किसी निर्णय पर पहुंच सकें।
बॉयोलॉजिकल पार्क को वर्ष 1988 में राज्य की वन्यजीव सलाहकार मंडल की 35वीं बैठक में मंजूरी मिली थी। यह पार्क नांता में अभेड़ा महल के पास 126 हैक्टेयर जमीन पर विकसित होना था। वन विभाग ने 2 करोड़ खर्च कर कुछ जमीन पर 2500 मीटर की दीवार भी बना दी। साल 2013 में सीजेडए के सचिव बीएस बोनल ने यहां का निरीक्षण किया तो बगल में नगर निगम का ट्रेचिंग ग्राउंड देखकर उन्होंने बॉयोलॉजिकल पार्क के निर्माण पर कड़ी आपत्ति की।
बोनल से विभाग को सख्त निर्देश दिए की पार्क का निर्माण तब तक न करे जब तक वहां से निगम का ट्रेचिंग ग्राउंड न हट जाए। इसके बाद वन विभाग ने इसको लेकर जिला प्रशासन को चिट्ठी लिखी। तब से लेकर आज तक जिला प्रशासन और नगर निगम ट्रेचिंग ग्राउंड की जमीन नहीं तलाश सका है। इस मामले को लेकर 20 अक्टूबर 2014 को रिटायर्ड आईएफएस वीके सालवान ने मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखा था। उन्होंने सीएम से वन्यजीव सलाहकार बोर्ड की अध्यक्ष होने के नाते मांग की थी कि वह स्व विवेक से आगे की कार्रवाई करें। वहां से भी इस मामले पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
सीजेडए की बड़ी लापरवाही
2.20 हैक्टेयर में दड़बे की तरह पिंजरों में रहते हैं 16 प्रजातियों के 154 वन्यजीव
बॉयोलॉजिकल पार्क नहीं बनने से चिड़ियाघर में वन्यजीव पिंजरे में कैद हैं। जबकि सीजेडए के मापदंडों के अनुसार वन्यजीवों के लिए पिंजरे उचित नहीं हैं। भास्कर टीम ने चिड़ियाघर में पिंजरों की स्थिति जांची तो जरख का पिंजरा 1800 वर्ग फीट का ही निकला। इतनी जगह में जरख कायदे से घूम फिर भी नहीं सकता है। यह अक्सर मांद में दुबका रहता है।
वहीं, बोनट बंदर के पिंजरे इतने छोटे हैं कि ये उछल-कूद नहीं कर सकते हैं। इनके पिंजरे 156 वर्ग फीट के हैं। ये पिंजरों में अक्सर सुस्ताते और दुबके रहते हैं। बब्बर शेर भी छोटे से पिंजरे में मायूस रहती है। इसका पिंजरा करीब 1276 वर्गफीट का है। यह इतना छोटा है कि शेरनी छलांग तक नहीं मार सकती है। जबकि सीजेडए के अनुसार बब्बर शेर के लिए चिड़ियाघर में 12,916 वर्गफीट, चीतल के लिए 25,833 वर्गफीट, जरख के लिए 5,381 वर्गफीट का स्पेस होना चाहिए।
सिंगल जानवर भी रह रहे हैं चिड़ियाघर में
सीजेडए के नियम के अनुसार चिड़ियाघर में किसी भी वन्यजीव को सिंगल नहीं रख सकते हैं। जबकि चिड़ियाघर में इस समय जरख, शेरनी और मादा पैंथर अकेले हैं। जिनका समाधान नहीं हो रहा हैं।
इसके लिए कलेक्टर रवि कुमार सुरपुर ने बॉयोलॉजिकल पार्क बनाने का वैकल्पिक रास्ता निकालने के लिए वन विभाग के पीसीसीफ को चिट्ठी लिखी है। ताकि जिला प्रशासन, नगर निगम और वन विभाग के अधिकारी मिलकर किसी निर्णय पर पहुंच सकें।
बॉयोलॉजिकल पार्क को वर्ष 1988 में राज्य की वन्यजीव सलाहकार मंडल की 35वीं बैठक में मंजूरी मिली थी। यह पार्क नांता में अभेड़ा महल के पास 126 हैक्टेयर जमीन पर विकसित होना था। वन विभाग ने 2 करोड़ खर्च कर कुछ जमीन पर 2500 मीटर की दीवार भी बना दी। साल 2013 में सीजेडए के सचिव बीएस बोनल ने यहां का निरीक्षण किया तो बगल में नगर निगम का ट्रेचिंग ग्राउंड देखकर उन्होंने बॉयोलॉजिकल पार्क के निर्माण पर कड़ी आपत्ति की।
बोनल से विभाग को सख्त निर्देश दिए की पार्क का निर्माण तब तक न करे जब तक वहां से निगम का ट्रेचिंग ग्राउंड न हट जाए। इसके बाद वन विभाग ने इसको लेकर जिला प्रशासन को चिट्ठी लिखी। तब से लेकर आज तक जिला प्रशासन और नगर निगम ट्रेचिंग ग्राउंड की जमीन नहीं तलाश सका है। इस मामले को लेकर 20 अक्टूबर 2014 को रिटायर्ड आईएफएस वीके सालवान ने मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखा था। उन्होंने सीएम से वन्यजीव सलाहकार बोर्ड की अध्यक्ष होने के नाते मांग की थी कि वह स्व विवेक से आगे की कार्रवाई करें। वहां से भी इस मामले पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
सीजेडए की बड़ी लापरवाही
2.20 हैक्टेयर में दड़बे की तरह पिंजरों में रहते हैं 16 प्रजातियों के 154 वन्यजीव
बॉयोलॉजिकल पार्क नहीं बनने से चिड़ियाघर में वन्यजीव पिंजरे में कैद हैं। जबकि सीजेडए के मापदंडों के अनुसार वन्यजीवों के लिए पिंजरे उचित नहीं हैं। भास्कर टीम ने चिड़ियाघर में पिंजरों की स्थिति जांची तो जरख का पिंजरा 1800 वर्ग फीट का ही निकला। इतनी जगह में जरख कायदे से घूम फिर भी नहीं सकता है। यह अक्सर मांद में दुबका रहता है।
वहीं, बोनट बंदर के पिंजरे इतने छोटे हैं कि ये उछल-कूद नहीं कर सकते हैं। इनके पिंजरे 156 वर्ग फीट के हैं। ये पिंजरों में अक्सर सुस्ताते और दुबके रहते हैं। बब्बर शेर भी छोटे से पिंजरे में मायूस रहती है। इसका पिंजरा करीब 1276 वर्गफीट का है। यह इतना छोटा है कि शेरनी छलांग तक नहीं मार सकती है। जबकि सीजेडए के अनुसार बब्बर शेर के लिए चिड़ियाघर में 12,916 वर्गफीट, चीतल के लिए 25,833 वर्गफीट, जरख के लिए 5,381 वर्गफीट का स्पेस होना चाहिए।
सिंगल जानवर भी रह रहे हैं चिड़ियाघर में
सीजेडए के नियम के अनुसार चिड़ियाघर में किसी भी वन्यजीव को सिंगल नहीं रख सकते हैं। जबकि चिड़ियाघर में इस समय जरख, शेरनी और मादा पैंथर अकेले हैं। जिनका समाधान नहीं हो रहा हैं।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai