1970 के दशक में कोटा की पहचान राजस्थान के कानपुर के रूप में थी। लेकिन, अब औद्योगिक माहौल खत्म हो चुका है। पिछले दो दशक में कोटा में 300 से ज्यादा उद्योग बंद हो चुके हैं। सरकार न तो यहां कोई इंडस्ट्री लगा रही है अौर न ही वेंटीलेटर पर जा रही इकाइयों को कोई छूट दे रही है।
शहर में सबसे बड़ा वज्रपात उस समय हुआ जब 1997 में जेके फैक्ट्री की चारों यूनिट बंद हो गईं। दूसरा बड़ा झटका 2012 में सेमटेल के बंद होने से लगा। इस दौरान कांग्रेस सत्ता में थी और उसके बड़े नेता चुप बैठे रहे। अब आईएल के मुद्दे पर यही भूमिका भाजपा के बड़े नेताओं की है।
केंद्र सरकार ने आईएल को चलाने से मना कर दिया जबकि राज्य सरकार इसको लेकर एक बैठक तक नहीं कर सकी है। इसके अलावा इस समय कोटा का स्टोन उद्योग और आसपास के सोया प्लांट भी इसी समस्या से जूझ रहे हैं।
कोटा में उद्याेगों के लिए अब जगह भी नहीं बची है। पिछले दिनों जमीन न मिलने की वजह से नमकीन बनाने की प्रमुख कंपनियों में शुमार बालाजी वेफर्स लौट गई थी। नया कुबेर एक्सटेंशन एरिया उद्योग लगाने के लिए डेवलप किया गया है, लेकिन इसको पर्यावरण की मंजूरी ही नहीं मिल रही है। यहां खनन माफिया भी सक्रिय है।
1970 का दशक
1961 से 1970 के बीच कोटा को राजस्थान के कानपुर के रूप में पहचान मिली थी। ये कोटा के उद्योगों के लिए सुनहरा दौर था। इसके बाद साल 1975 से गोपाल मिल की बंदी के साथ उद्योगों के बंद होने का सिलसिला शुरू हुआ सिलसिला आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा।
सरकारी प्रयास कुछ नहीं
लघु उद्योग भारती के प्रांतीय अध्यक्ष गोविंदराम मित्तल ने कोटा को औद्योगिक नगरी के रूप में भी देखा है और इसके पतन के भी साक्षी रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार की ओर से आज तक बंद होने वाले उद्योगों को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए। चाहे निजी क्षेत्र के हों या सार्वजनिक क्षेत्र के। प्रयास हुए होते तो आज कोटा की तस्वीर ही अलग ही होती।
बंद होने वाले उद्योग
- प्रीमियर केबल इंडस्ट्री
- नागपाल वेफर्स मिल
- माचिस फैक्ट्री
- गोपाल मिल (1975)
- ओरियंटल पावर केबल लिमिटेड (1986)
- कोटा प्रीमियर बोर्ड (1986)
- जेके फैक्ट्री (1997)
- के पाटन शुगर मिल
- सेमटेल ग्लास एवं कलर इंडस्ट्री (2012)
- 20 राइस मिलें
- 18 दाल मिलें
- पोहा मिलें
- 5 सोया प्लांट
- 250 स्टोन इंडस्ट्री
बैनर पर लिखी अपनी बात, शहरवासी बोले-आंखें खोलो सरकार
आईएल को बचाने के लिए शहरवासियों ने बुधवार से मुहिम शुरू कर दी है। शुरुआत तलवंडी से हुई, जहां के दुकानदारों व आमजन ने 40 फीट लंबे बैनर पर आईएल को लेकर अपने मन की बात रखी। कई बुजुर्ग भी यहां पहुंचे और बैनर पर प्रतिक्रिया दी। सभी लोगों ने अपने रिएक्शन में यही कहा कि किसी भी सूरत में यह उद्योग बंद नहीं हो। आईएल से हजारों परिवार से जुड़े हैं, सरकार को अब इस मामले में आंखें खोलनी चाहिए। किसी ने लिखा आईएल को बंद करने वालों, कोटा कभी माफ नहीं करेगा। जवाहर नगर व्यापार संघ के लहरी शंकर गौतम, अचल मेवाड़ा, कपिल बनानी, गोपाल लाल सेन, राजेंद्र सोनी, इकबाल सिंह, न्यू कोटा प्रॉपर्टी डीलर एसोसिएशन के संरक्षक दौलत लालवानी, अध्यक्ष दिलीप सिंह चौहान आदि ने बैनर पर रिएक्शन लिखे।
आईएल को लेकर 16 को सड़कों पर उतरेगा शहर
आईएल को बचाने के लिए 16 फरवरी को शहर सड़कों पर उतरेगा। आईएल कर्मचारियों व शहर के जागरूक युवाओं की पहल पर यह साझा आंदोलन शुरू किया गया है। आईएल कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारी हुकम सिंह व घनश्याम बैरवा ने बताया कि इस उद्योग पर आए संकट को टालने के लिए अब शहरवासी भी उनके साथ आ रहे हैं। ऐसे में यह तय किया गया है कि 16 फरवरी को बड़ा आंदोलन किया जाए। इससे पहले पूरे शहर में जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत शहर के सभी व्यापारिक, सामाजिक, औद्योगिक व राजनीतिक संगठनों के पास जाएंगे और उनसे आंदोलन में शामिल होने का अनुरोध करेंगे। आंदोलन की रूपरेखा बाद में होने वाली बैठकों में तय की जाएगी।
भूलिए मत! आज आईएल को आपकी जरूरत है, कल आपकी बारी भी होगी
भास्कर हस्तक्षेप : विजय सिंह चौहान
20 भागों में बंटी कांग्रेस और 22 में छिन्न-भिन्न भाजपा। कोटा की आज की राजनीति का यह चरित्र हमारे लिए दुर्भाग्य बन गया है। नेताओं का अहम इतना बड़ा हो गया है कि ये शहर के सबसे बड़े मुद्दे पर भी एक नहीं हो रहे। दरअसल, इस समय जो पीढ़ी शहर का राजनीितक नेतृत्व कर रही है वह अपने पद, कद और क्षेत्र में ही बिजी है। ऐसा नहीं कि यह लड़ने में सक्षम नहीं, समर्थ नहीं। हां, है- बिल्कुल, लेकिन सिर्फ वहीं खड़ी होती है जहां वोट से जुड़ा सीधा मसला हो या फिर सुर्खियां। एक और बात यह पीढ़ी पूरे समय काम करते दिखती है। सदनों में प्रश्न पर प्रश्न पूछती है। पत्र लिखती है। अच्छी बात है, लेकिन जो मुद्दे शहर की पहचान से जुड़े हों उसमें ही फेल हो जाएं तो फिर किस बात की राजनीितक ताकत?
यही आचरण और सीख इनकी छाया में बढ़ रही सेकंड लाइन में जा रहा है। और युवा पौध का तो क्या? यह ‘युवा कम और बच्चा’, ज्यादा है। जिन्हें रोजगार के लिए हुंकार भरनी चाहिए वे औपचारिकता के लिए शिक्षा के मंदिरों में भैंस घुमा रहे हैं। अब आप सोच ही सकते हैं जिस शहर की राजनीति एेसी हो वहां उद्योग बंद नहीं होंगे तो क्या होगा?
अब पुरानी राजनीति देखिए- काम धंधे के लिए बैराज लाए, थर्मल लगाया, आईएल खड़ी की, एनटीपीसी अंता (अब विभाजन से बारां जिले में ) लगाई, लेकिन अब क्या? नई पीढ़ी के खाते में गिनाने के लिए एक नाम तक नहीं है। उल्टा इनकी अपने क्षेत्र तक सिमटी राजनीति ने पूरा औद्योगिक माहौल ही खत्म कर दिया। वो तो शुक्र है बंसल सर का। जेके बंद होने के बाद कोटा टूट चुका था, लेकिन उन्होंने अपने ज्ञान और कोचिंग के दम पर इसे फिर खड़ा कर दिया। आज का कोटा िशक्षकों की देन है न कि किसी सरकार की। और यह भ्रम टूटना ही चाहिए। यह नेताओं को अच्छे से समझना चाहिए कि आज आईएल और शहर को उनकी जरूरत है और कुछ महीनों बाद उनको हमारी होगी?
शहर में सबसे बड़ा वज्रपात उस समय हुआ जब 1997 में जेके फैक्ट्री की चारों यूनिट बंद हो गईं। दूसरा बड़ा झटका 2012 में सेमटेल के बंद होने से लगा। इस दौरान कांग्रेस सत्ता में थी और उसके बड़े नेता चुप बैठे रहे। अब आईएल के मुद्दे पर यही भूमिका भाजपा के बड़े नेताओं की है।
केंद्र सरकार ने आईएल को चलाने से मना कर दिया जबकि राज्य सरकार इसको लेकर एक बैठक तक नहीं कर सकी है। इसके अलावा इस समय कोटा का स्टोन उद्योग और आसपास के सोया प्लांट भी इसी समस्या से जूझ रहे हैं।
कोटा में उद्याेगों के लिए अब जगह भी नहीं बची है। पिछले दिनों जमीन न मिलने की वजह से नमकीन बनाने की प्रमुख कंपनियों में शुमार बालाजी वेफर्स लौट गई थी। नया कुबेर एक्सटेंशन एरिया उद्योग लगाने के लिए डेवलप किया गया है, लेकिन इसको पर्यावरण की मंजूरी ही नहीं मिल रही है। यहां खनन माफिया भी सक्रिय है।
1970 का दशक
1961 से 1970 के बीच कोटा को राजस्थान के कानपुर के रूप में पहचान मिली थी। ये कोटा के उद्योगों के लिए सुनहरा दौर था। इसके बाद साल 1975 से गोपाल मिल की बंदी के साथ उद्योगों के बंद होने का सिलसिला शुरू हुआ सिलसिला आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा।
सरकारी प्रयास कुछ नहीं
लघु उद्योग भारती के प्रांतीय अध्यक्ष गोविंदराम मित्तल ने कोटा को औद्योगिक नगरी के रूप में भी देखा है और इसके पतन के भी साक्षी रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार की ओर से आज तक बंद होने वाले उद्योगों को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए। चाहे निजी क्षेत्र के हों या सार्वजनिक क्षेत्र के। प्रयास हुए होते तो आज कोटा की तस्वीर ही अलग ही होती।
बंद होने वाले उद्योग
- प्रीमियर केबल इंडस्ट्री
- नागपाल वेफर्स मिल
- माचिस फैक्ट्री
- गोपाल मिल (1975)
- ओरियंटल पावर केबल लिमिटेड (1986)
- कोटा प्रीमियर बोर्ड (1986)
- जेके फैक्ट्री (1997)
- के पाटन शुगर मिल
- सेमटेल ग्लास एवं कलर इंडस्ट्री (2012)
- 20 राइस मिलें
- 18 दाल मिलें
- पोहा मिलें
- 5 सोया प्लांट
- 250 स्टोन इंडस्ट्री
बैनर पर लिखी अपनी बात, शहरवासी बोले-आंखें खोलो सरकार
आईएल को बचाने के लिए शहरवासियों ने बुधवार से मुहिम शुरू कर दी है। शुरुआत तलवंडी से हुई, जहां के दुकानदारों व आमजन ने 40 फीट लंबे बैनर पर आईएल को लेकर अपने मन की बात रखी। कई बुजुर्ग भी यहां पहुंचे और बैनर पर प्रतिक्रिया दी। सभी लोगों ने अपने रिएक्शन में यही कहा कि किसी भी सूरत में यह उद्योग बंद नहीं हो। आईएल से हजारों परिवार से जुड़े हैं, सरकार को अब इस मामले में आंखें खोलनी चाहिए। किसी ने लिखा आईएल को बंद करने वालों, कोटा कभी माफ नहीं करेगा। जवाहर नगर व्यापार संघ के लहरी शंकर गौतम, अचल मेवाड़ा, कपिल बनानी, गोपाल लाल सेन, राजेंद्र सोनी, इकबाल सिंह, न्यू कोटा प्रॉपर्टी डीलर एसोसिएशन के संरक्षक दौलत लालवानी, अध्यक्ष दिलीप सिंह चौहान आदि ने बैनर पर रिएक्शन लिखे।
आईएल को लेकर 16 को सड़कों पर उतरेगा शहर
आईएल को बचाने के लिए 16 फरवरी को शहर सड़कों पर उतरेगा। आईएल कर्मचारियों व शहर के जागरूक युवाओं की पहल पर यह साझा आंदोलन शुरू किया गया है। आईएल कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारी हुकम सिंह व घनश्याम बैरवा ने बताया कि इस उद्योग पर आए संकट को टालने के लिए अब शहरवासी भी उनके साथ आ रहे हैं। ऐसे में यह तय किया गया है कि 16 फरवरी को बड़ा आंदोलन किया जाए। इससे पहले पूरे शहर में जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत शहर के सभी व्यापारिक, सामाजिक, औद्योगिक व राजनीतिक संगठनों के पास जाएंगे और उनसे आंदोलन में शामिल होने का अनुरोध करेंगे। आंदोलन की रूपरेखा बाद में होने वाली बैठकों में तय की जाएगी।
भूलिए मत! आज आईएल को आपकी जरूरत है, कल आपकी बारी भी होगी
भास्कर हस्तक्षेप : विजय सिंह चौहान
20 भागों में बंटी कांग्रेस और 22 में छिन्न-भिन्न भाजपा। कोटा की आज की राजनीति का यह चरित्र हमारे लिए दुर्भाग्य बन गया है। नेताओं का अहम इतना बड़ा हो गया है कि ये शहर के सबसे बड़े मुद्दे पर भी एक नहीं हो रहे। दरअसल, इस समय जो पीढ़ी शहर का राजनीितक नेतृत्व कर रही है वह अपने पद, कद और क्षेत्र में ही बिजी है। ऐसा नहीं कि यह लड़ने में सक्षम नहीं, समर्थ नहीं। हां, है- बिल्कुल, लेकिन सिर्फ वहीं खड़ी होती है जहां वोट से जुड़ा सीधा मसला हो या फिर सुर्खियां। एक और बात यह पीढ़ी पूरे समय काम करते दिखती है। सदनों में प्रश्न पर प्रश्न पूछती है। पत्र लिखती है। अच्छी बात है, लेकिन जो मुद्दे शहर की पहचान से जुड़े हों उसमें ही फेल हो जाएं तो फिर किस बात की राजनीितक ताकत?
यही आचरण और सीख इनकी छाया में बढ़ रही सेकंड लाइन में जा रहा है। और युवा पौध का तो क्या? यह ‘युवा कम और बच्चा’, ज्यादा है। जिन्हें रोजगार के लिए हुंकार भरनी चाहिए वे औपचारिकता के लिए शिक्षा के मंदिरों में भैंस घुमा रहे हैं। अब आप सोच ही सकते हैं जिस शहर की राजनीति एेसी हो वहां उद्योग बंद नहीं होंगे तो क्या होगा?
अब पुरानी राजनीति देखिए- काम धंधे के लिए बैराज लाए, थर्मल लगाया, आईएल खड़ी की, एनटीपीसी अंता (अब विभाजन से बारां जिले में ) लगाई, लेकिन अब क्या? नई पीढ़ी के खाते में गिनाने के लिए एक नाम तक नहीं है। उल्टा इनकी अपने क्षेत्र तक सिमटी राजनीति ने पूरा औद्योगिक माहौल ही खत्म कर दिया। वो तो शुक्र है बंसल सर का। जेके बंद होने के बाद कोटा टूट चुका था, लेकिन उन्होंने अपने ज्ञान और कोचिंग के दम पर इसे फिर खड़ा कर दिया। आज का कोटा िशक्षकों की देन है न कि किसी सरकार की। और यह भ्रम टूटना ही चाहिए। यह नेताओं को अच्छे से समझना चाहिए कि आज आईएल और शहर को उनकी जरूरत है और कुछ महीनों बाद उनको हमारी होगी?
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai