24 घंटे, हफ्ते के सातों दिन और साल के 365 दिन। न कोई छुट्टी, न वीकली आॅफ और न लंच टाइम। ये ड्यूटी किसी बंधुआ मजदूर की नहीं बल्कि मेडिकल कॉलेज के रेजीडेंट्स की है। पहले वर्ष के रेजीडेंट तो दो-दो दिन तक नहा भी नहीं पाते। पीजी स्टूडेंट्स के लिए यह हैरानी वाली बात भी नहीं।
कोटा मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट डॉ. चंद्रप्रकाश सैनी के जयपुर में सुसाइड की घटना के बाद भास्कर ने उन्हीं के साथियों के बीच बैठकर उनकी ड्यूटी को लेकर सवाल किए तो चौंकाने वाले जवाब आए। ड्यूटी शुरू कब से होती है तो जवाब मिला खत्म होगी तो शुरू होगी ना...। लंच टाइम कब होता है? तो बोले-जब एडजस्टमेंट के लिए कोई साथी आ जाए। एमसीआई के नियम क्या कहते हैं? तो बताया कि जितने घंटे एमसीआई पूरे सप्ताह में ड्यूटी के लिए कहती है, उतनी तो हम 2 दिन में ही कर रहे हैं।
इन जवाबों से आसानी से समझा जा सकता है कि मेडिकल स्टूडेंट्स में डिप्रेशन की शुरुआत कहां से होती है? यह बात अलग है कि एमबीबीएस करने के दौरान स्टूडेंट मेच्योर हो जाता है और इस जटिल स्थिति को भी झेल जाता है। अपने साथी के सुसाइड से कोटा में बुधवार को रेजीडेंट्स में खासा आक्रोश रहा, उन्होंने एमबीएस के पीजी हॉस्टल में एसोसिएशन की बैठक की और नए अस्पताल के मेन गेट पर कैंडिल मार्च भी निकाला।
राउंड द क्लॉक होती है फर्स्ट ईयर रेजीडेंट की ड्यूटी
- सुबह 8 से 10 बजे : ठीक 8 बजे हॉस्पिटल पहुंचना होता है। 10 बजे तक प्रोफेसर के राउंड से पहले यूनिट में भर्ती सभी रोगियों के पर्चे देखने होते हैं, जरूरी ट्रीटमेंट लिखना होता है, जांच रिपोर्ट कलेक्ट करनी होती है, ट्रीटमेंट पर नोट डालने होते हैं और फाइल तैयार रखनी होती है।
- सुबह 10 से 11 बजे : यह प्रोफेसर के राउंड का समय होता है। इसमें बदलाव होता रहता है। इस दौरान उनके साथ खड़े रहकर एक-एक रोगी दिखाना होता है, उसकी सारी स्थिति से अवगत कराना होता है। पर्चों में रही कमियों को लेकर डांट-फटकार भी सुननी होती है।
- 11 से दोपहर 3 बजे : अपनी यूनिट के ओपीडी में जाकर रोगी देखने होते हैं। नए रोगी भर्ती करने होते हैं और इस दौरान वार्ड में भर्ती रोगियों से जुड़ी कोई समस्या हो तो उसे भी अटेंड करना होता है। कई रेफरेंस भी आते हैं, उन्हें भी देखने जाना होता है।
- दोपहर 3 से शाम 4 बजे : रेजीडेंट को हॉस्टल पहुंचने में 4 रोज बजते हैं। जल्दबाजी में खाना खाकर फिर से अस्पताल। मेस का खाना दोपहर को ही बन जाता है, ऐसे में यह आसानी से समझा जा सकता है कि 4 बजे तक उसकी क्या स्थिति रहती होगी।
- शाम 4 से रात 8 बजे : खाना खाने के बाद फिर से अस्पताल पहुंचकर शाम का राउंड करना होता है। इस राउंड में रोगी और उनके परिजनों के सारे डाउट्स भी क्लियर करने होते हैं। सुबह प्रोफेसर द्वारा दिए गए निर्देश भी उन्हें बताने होते हैं। इसी समय में कुछ पढ़ाई भी करनी होती है।
- रात 8 से सुबह 8 बजे : आफिशियली कोई नाइट ड्यूटी नहीं होती, लेकिन सीनियर्स की एवज में ड्यूटी करनी होती है। यह “कुप्रथा’ सी चली आ रही है, जिसे लेकर सीनियर एक ही तर्क देते हैं कि उन्होंने भी
ऐसे ही ड्यूटी की है, तुम भी करो।
कही जाना भी मुश्किल
इस ड्यूटी सिस्टम के अलावा कोई भी रेजीडेंट कहीं जाता है तो वह चोरी-छिपे या अपने साथी को बैठाकर जाता है। “बॉस’ की कॉल आने पर तत्काल हॉस्पिटल पहुंचना होता है और ज्यादातर डांट भी सुननी पड़ती है। यह शिड्यूल उन विभागों का है, जिनकी इमरजेंसी ड्यूटी आती है।
वह कहता था-यहां न रात होती और न दिन
ज्वॉइन करने के कुछ दिन बाद से ही वह यह कहने लगा था कि “यहां न रात होती, न दिन, 24 घंटे ड्यूटी करते हैं, यह भी कोई जिंदगी है?’ उसके कोई हेड थे, जिन्हें लेकर भी वह परेशान था। वह कहता था कि
वह कुछ भी बोल देते हैं। मैं बार-बार उससे बात करता था और उसे समझाने के लिए दो बार कोटा भी आया था। हम चाहते हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाए। इसके लिए जयपुर जाकर एफआईआर दर्ज कराएंगे। (जैसा मृतक चंद्रप्रकाश सैनी के भाई विनीत ने बताया)
रेजीडेंट की पत्नी भी कर चुकी है सुसाइड
इस सुसाइड से पहले भी मई, 2015 में एमबीएस के पीजी हॉस्टल में एक रेजीडेंट की पत्नी सुसाइड कर चुकी है। तब भी यही बात सामने आई थी कि उसका पति फर्स्ट ईयर स्टूडेंट था। लगातार ड्यूटी के चलते वह घर पर बिल्कुल समय नहीं दे पा रहा था। वह कई-कई दिन तक घर नहीं लौटता था। इसे लेकर पत्नी डिप्रेशन का शिकार थी।
क्या कहते हैं एमसीआई के नियम?
एमसीआई के नियमों के तहत रेजीडेंट से पूरे सप्ताह में 48 घंटे काम लिया जा सकता है। दिल्ली के मेडिकल कॉलेजों में यही पैटर्न लागू है। वहां रेजीडेंट पर निर्भर है कि वह यह ड्यूटी एक साथ करना चाहता है या रोजाना 6 घंटे। लेकिन राजस्थान में डॉक्टरों की भारी कमी की वजह से पूरा दारोमदार रेजीडेंट्स के ही भरोसे है। मेडिकल कॉलेजों की इमरजेंसी सेवाएं तो चल ही इनके बूते रही है।
प्रिंसिपल ने अधीक्षक व एचओडी से मांगे कमेंट
रेजीडेंट खुदकुशी मामले में मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. गिरीश वर्मा ने नए अस्पताल के अधीक्षक व शिशु रोग विभाग के एचओडी से कमेंट मांगे हैं। उन्होंने दोनों को पत्र भेजकर पूरे मामले की रिपोर्ट मांगी है।
डॉ. वर्मा ने बताया कि मामले की जांच पुलिस अपने स्तर पर कर रही है।
मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर गिरीश वर्मा ने बताया कि फर्स्ट ईयर अपने सीनियर की जगह क्यों ड्यूटी करते हैं। उन्हें बिलकुल नहीं करनी चाहिए। यदि कोई दिक्कत है तो अपने यूनिट हेड को बताएं और यूनिट हेड भी इस बात का ध्यान रखें। एमसीआई गाइडलाइन के हिसाब से ड्यूटी के घंटे कहीं भी नहीं है। व्यावहारिक रूप में इनके लिए सबकुछ किया जा सकता है, क्योंकि ये स्टूडेंट हर मेडिकल कॉलेज की बैकबोन होते हैं।
कोटा मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट डॉ. चंद्रप्रकाश सैनी के जयपुर में सुसाइड की घटना के बाद भास्कर ने उन्हीं के साथियों के बीच बैठकर उनकी ड्यूटी को लेकर सवाल किए तो चौंकाने वाले जवाब आए। ड्यूटी शुरू कब से होती है तो जवाब मिला खत्म होगी तो शुरू होगी ना...। लंच टाइम कब होता है? तो बोले-जब एडजस्टमेंट के लिए कोई साथी आ जाए। एमसीआई के नियम क्या कहते हैं? तो बताया कि जितने घंटे एमसीआई पूरे सप्ताह में ड्यूटी के लिए कहती है, उतनी तो हम 2 दिन में ही कर रहे हैं।
इन जवाबों से आसानी से समझा जा सकता है कि मेडिकल स्टूडेंट्स में डिप्रेशन की शुरुआत कहां से होती है? यह बात अलग है कि एमबीबीएस करने के दौरान स्टूडेंट मेच्योर हो जाता है और इस जटिल स्थिति को भी झेल जाता है। अपने साथी के सुसाइड से कोटा में बुधवार को रेजीडेंट्स में खासा आक्रोश रहा, उन्होंने एमबीएस के पीजी हॉस्टल में एसोसिएशन की बैठक की और नए अस्पताल के मेन गेट पर कैंडिल मार्च भी निकाला।
राउंड द क्लॉक होती है फर्स्ट ईयर रेजीडेंट की ड्यूटी
- सुबह 8 से 10 बजे : ठीक 8 बजे हॉस्पिटल पहुंचना होता है। 10 बजे तक प्रोफेसर के राउंड से पहले यूनिट में भर्ती सभी रोगियों के पर्चे देखने होते हैं, जरूरी ट्रीटमेंट लिखना होता है, जांच रिपोर्ट कलेक्ट करनी होती है, ट्रीटमेंट पर नोट डालने होते हैं और फाइल तैयार रखनी होती है।
- सुबह 10 से 11 बजे : यह प्रोफेसर के राउंड का समय होता है। इसमें बदलाव होता रहता है। इस दौरान उनके साथ खड़े रहकर एक-एक रोगी दिखाना होता है, उसकी सारी स्थिति से अवगत कराना होता है। पर्चों में रही कमियों को लेकर डांट-फटकार भी सुननी होती है।
- 11 से दोपहर 3 बजे : अपनी यूनिट के ओपीडी में जाकर रोगी देखने होते हैं। नए रोगी भर्ती करने होते हैं और इस दौरान वार्ड में भर्ती रोगियों से जुड़ी कोई समस्या हो तो उसे भी अटेंड करना होता है। कई रेफरेंस भी आते हैं, उन्हें भी देखने जाना होता है।
- दोपहर 3 से शाम 4 बजे : रेजीडेंट को हॉस्टल पहुंचने में 4 रोज बजते हैं। जल्दबाजी में खाना खाकर फिर से अस्पताल। मेस का खाना दोपहर को ही बन जाता है, ऐसे में यह आसानी से समझा जा सकता है कि 4 बजे तक उसकी क्या स्थिति रहती होगी।
- शाम 4 से रात 8 बजे : खाना खाने के बाद फिर से अस्पताल पहुंचकर शाम का राउंड करना होता है। इस राउंड में रोगी और उनके परिजनों के सारे डाउट्स भी क्लियर करने होते हैं। सुबह प्रोफेसर द्वारा दिए गए निर्देश भी उन्हें बताने होते हैं। इसी समय में कुछ पढ़ाई भी करनी होती है।
- रात 8 से सुबह 8 बजे : आफिशियली कोई नाइट ड्यूटी नहीं होती, लेकिन सीनियर्स की एवज में ड्यूटी करनी होती है। यह “कुप्रथा’ सी चली आ रही है, जिसे लेकर सीनियर एक ही तर्क देते हैं कि उन्होंने भी
ऐसे ही ड्यूटी की है, तुम भी करो।
कही जाना भी मुश्किल
इस ड्यूटी सिस्टम के अलावा कोई भी रेजीडेंट कहीं जाता है तो वह चोरी-छिपे या अपने साथी को बैठाकर जाता है। “बॉस’ की कॉल आने पर तत्काल हॉस्पिटल पहुंचना होता है और ज्यादातर डांट भी सुननी पड़ती है। यह शिड्यूल उन विभागों का है, जिनकी इमरजेंसी ड्यूटी आती है।
वह कहता था-यहां न रात होती और न दिन
ज्वॉइन करने के कुछ दिन बाद से ही वह यह कहने लगा था कि “यहां न रात होती, न दिन, 24 घंटे ड्यूटी करते हैं, यह भी कोई जिंदगी है?’ उसके कोई हेड थे, जिन्हें लेकर भी वह परेशान था। वह कहता था कि
वह कुछ भी बोल देते हैं। मैं बार-बार उससे बात करता था और उसे समझाने के लिए दो बार कोटा भी आया था। हम चाहते हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाए। इसके लिए जयपुर जाकर एफआईआर दर्ज कराएंगे। (जैसा मृतक चंद्रप्रकाश सैनी के भाई विनीत ने बताया)
रेजीडेंट की पत्नी भी कर चुकी है सुसाइड
इस सुसाइड से पहले भी मई, 2015 में एमबीएस के पीजी हॉस्टल में एक रेजीडेंट की पत्नी सुसाइड कर चुकी है। तब भी यही बात सामने आई थी कि उसका पति फर्स्ट ईयर स्टूडेंट था। लगातार ड्यूटी के चलते वह घर पर बिल्कुल समय नहीं दे पा रहा था। वह कई-कई दिन तक घर नहीं लौटता था। इसे लेकर पत्नी डिप्रेशन का शिकार थी।
क्या कहते हैं एमसीआई के नियम?
एमसीआई के नियमों के तहत रेजीडेंट से पूरे सप्ताह में 48 घंटे काम लिया जा सकता है। दिल्ली के मेडिकल कॉलेजों में यही पैटर्न लागू है। वहां रेजीडेंट पर निर्भर है कि वह यह ड्यूटी एक साथ करना चाहता है या रोजाना 6 घंटे। लेकिन राजस्थान में डॉक्टरों की भारी कमी की वजह से पूरा दारोमदार रेजीडेंट्स के ही भरोसे है। मेडिकल कॉलेजों की इमरजेंसी सेवाएं तो चल ही इनके बूते रही है।
प्रिंसिपल ने अधीक्षक व एचओडी से मांगे कमेंट
रेजीडेंट खुदकुशी मामले में मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. गिरीश वर्मा ने नए अस्पताल के अधीक्षक व शिशु रोग विभाग के एचओडी से कमेंट मांगे हैं। उन्होंने दोनों को पत्र भेजकर पूरे मामले की रिपोर्ट मांगी है।
डॉ. वर्मा ने बताया कि मामले की जांच पुलिस अपने स्तर पर कर रही है।
मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर गिरीश वर्मा ने बताया कि फर्स्ट ईयर अपने सीनियर की जगह क्यों ड्यूटी करते हैं। उन्हें बिलकुल नहीं करनी चाहिए। यदि कोई दिक्कत है तो अपने यूनिट हेड को बताएं और यूनिट हेड भी इस बात का ध्यान रखें। एमसीआई गाइडलाइन के हिसाब से ड्यूटी के घंटे कहीं भी नहीं है। व्यावहारिक रूप में इनके लिए सबकुछ किया जा सकता है, क्योंकि ये स्टूडेंट हर मेडिकल कॉलेज की बैकबोन होते हैं।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai